खुद से पहल


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पिछले कुछ वर्षों से असुरक्षा की दिल दहला देने वाली कई घटनाएं सामने आई हैं। इसकी कई वजह हो सकती है, ये भी हो सकता है कि असल में संकुचित मानसिकता के कारण यह घटनाएं बढी हों या तो फिर इसको ले कर  हमारी जागरूकता में बदलाव आया हो। कारण कुछ भी हो, गौरतलब तो ये बात है कि महिलाओ के प्रति अवहेलना और उत्पीड़न अब बड़ी तेजी से हमारी दहलीज़ खटखटा रहा है।

आज हम सब असुरक्षित हैं। न्याय के लिए चीखें निरंतर गूंज रही हैं, पर कहीं न कहीं हम असमर्थ हैं, कभी डर तो कभी प्रतिष्ठा के बोझ से जकडे़ हुए हैं। चाहे हम खुद को कितना भी सशक्त मान ले आज भी जब कभी हमारे साथ किसी भी तरह की प्रताड़ना होती हैं तो हम पहले चुप रहते है, हम इंतजार करते है कि सब खुद ठीक हो जाए। किसी अन्य का उदाहरण न देके स्वयं की ही बात करूंगी। मैं भी अपने साथ हुए घटनाओं के लिये खुद को ही दोषी मानती थी, मुझे भी लोगों ने प्रभावित कर ही दिया था कि कही न कहीं ग़लती मेरी हैं। मैं भी अपने लिए दायरे बनाने लगी थी कि मुझे क्या पहनना है, कहाँ जाना हैँ, कब जाना है, किसके साथ जाना हैं, कब क्या बोलना हैं।चीजें होती गई कभी स्कुल तो कभी सड़क पे और हर बार मुझे ये एहसास कराया गया कि मुझमे ही कमी हैं।

samiksha

पर , मैंने एक बार इसके प्रति विचार किया कि मेरी गलती क्यों होगी, जब मेरे हित के लिये कानून है तो मैं कैसे दोषी?

मानसिकता उनकी बुरी हैं मेरी नहीं। और वही से मैंने पहल करी कि हमें अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी , हम जब खुद को इज्ज़त देते है तब हम अपनी अहमियत समझते हैं। मैंने व्यक्तिगत तौर पर    पढ़ना शुरू किया , खुद को जागरूक करना शुरू किया।

इस असुरक्षा के दायरे में हम सब हैं, पर हमें ये मानना होगा कि महिलाएं सबसे वंचित तबका हैं।

उन तमाम नीतियों और विरोध के बावजूद भी हम महिलाओं को सुरक्षित माहौल नहीं दे पाए हैं। घर हो या बाजा़र सुरक्षा हाशिये पर है।

तो अब सवाल ये उठता है कि आख़िर बदलाव कैसे? बदलाव की पहली सीढ़ी है मानसिकता में बदलाव और फिर न्याय प्रक्रिया में । हमें ये समझना होगा कि हम बराबर हैं, क्योंकि ये सिर्फ कहने की बात नही है। बराबरी एक एहसास है और जबतक ये हर मामले में न हो हम तब तक असक्षम हैं।

आज जरूरत है एक जुट होने की, असुरक्षा के खिलाफ आवाज़ उठाने की। केवल औरतें नहीं पुरुषों की भी आवाज़ होनी चाहिए। हम तभी एक सुरक्षित माहौल की नींव रख पाएंगे। युवा का सहयोग बहुत महत्वपूर्ण है एक सुरक्षित कल के निर्माण के लिए। युवा पीढ़ी मे जागरूकता की तो जरूरत है ही कि युवा हर स्त्री की इज्ज़त करें क्योंकि गरिमा से रहना सबका हक़ हैं।इसके आलावा mass media के मदद से हम युवाओं को सुरक्षा के विषय मे , उसके महत्व के बारे मे बता सकते है। mass media  से भी ज्यादा जरूरी है mouth media जिसके द्वारा हम ग्रुप मे बैठ के “सुरक्षा सबके लिए ” के बारे मे जागरूकता फैला सकते हैं। कहते हैं साहित्य समाज का दरपन हैं, तो ये जरूरी है कि उस दरपन मे हम महिलाओं के वस्तुकरण को न दिखाए क्योंकि वो युवाओं पे गलत प्रभाव डालती हैं।

“हम आज़ाद तब होगें, जब हम सुरक्षित होंगें,
हम सुरक्षित तब होंगे, जब हम आज़ाद होंगे।”

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