अन्तराष्ट्रीय घरेलू कामगार दिवस

Facebooktwittergoogle_plusredditpinterestlinkedinmail

16 जून, अन्तराष्ट्रीय घरेलू कामगार दिवस – दुनिया के बहुत से देशो में इस दिन को मनाया जाता है | ये दिन उन संगठनो के लिए एक प्रतीक के रूप में देखा जाता है जो की घरेलू कामगारो के हक़ के लिए काम कर रहे है | पर और किसी जगह हलचल नहीं दिखाई देती | बहुत से लोग इस दिन के बारे में नहीं जानते, क्या उसका कारण ये है की ये दिन सिर्फ उन लोगो के लिए है जो इस संघर्ष के साथ जुड़े है? और उस संघर्ष के साथ कोई जुड़ना नहीं चाहता | हम सबके घर में कोई काम करने आता है, और उस व्यक्ति के लिए हम मालिक होते है तो हमारी भी कुछ जिम्मेदारी होती है उनके प्रति |

16 जून को मार्किट में ऐसी कोई भी गिफ्ट गैलरी नहीं थी जो कि घरेलू कामगार के लिए उनके दिन के कार्ड बेच रहा हो | शायद कोई खरीदने वाला हो तो आगे बेचने वाले भी आ जाये | 16 जून के आस पास ऐसा भी नहीं हुआ की ऑनलाइन विक्रेताओ में होड़ लगी हो की आइये इस साल अपने घर में काम करने वाली महिला के लिए कुछ लीजिये और उनका भी दिन स्पेशल बनाइये | हम में से कई लोगो के लिए ये भी समझना मुश्किल था की इस दिन क्या करना चाहिए | आज कल बाज़ार हमारी संवेदनाओ को उजागर करने में मदद करता है, पर शायद अभी कुछ समय है इस बाज़ार को तैयार होने में |

एक घरेलू कामगार महिला ने अपनी जानकारी के हिसाब से बताया, ऐसा एक दिन होता तो हैए जिस दिन काम करने वालो को आराम दिया जाता हैए पर अभी नहीं है, वो दिन निकल चूका है | साहब की छुट्टी होती है उस दिन छुट्टी सिर्फ काम करने वालो को ही मिलती है | काम सिर्फ साहब थोड़ी करते है, हम भी करते है तो छुट्टी तो हमे भी मिलने चाहिए | पर ऐसा होता नहीं है | सब बात सुनते है पर हमारे काम को काम समझा कहाँ जाता है? ये सवाल हम सब के लिए है! घरेलू कामगारए क्या हम उनके काम को काम समझते है? क्या हम उनके काम को काम समझना भी चाहते है? बात सिर्फ हक़ की नहीं है, न ही उस दिन की छुट्टी से है न ही उन गिफ्ट्स की जो हम अपने आस पास के लोगो को देते है ऐसे ही किसी दिन पर असंगठित क्षेत्र के मजदूर को छुट्टी से क्या मिलेगा? उस दिन काम न करने के पैसे तो नहीं मिलेंगे | फिर क्यूँ हर साल इस दिन को दुनिया के अलग अलग हिस्सों में लोग मानते है? इससे क्या होता है, मजदूरों के नाम पर दिन क्यों रखा जाता है? पिछले कई सालो में, जब से लोगो ने मजदूर दिवस (May Day) पर बात करनी शुरू की है तो इस दिन से ये तो ज़रूर हुआ है की लोग उस दिन मजदूरों के संघर्ष पर बात करते है, जो नहीं जानते है वो समझने का प्रयास करते है|

Creative 2

मजदूर दिवस की तरह घरेलू कामगार दिवस से हमारी भी वही आशा है की घरेलू काम भी काम है और इसे भी लोग उसी तरह देखना शुरू करे | मजदूर दिवस के साथ एक लम्बा संघर्ष जुड़ा है,कामए रोजगारी और समय से जुड़े सवाल भी इसी के साथ उठने शुरू हुए | कुछ ऐसे ही सवाल और मुद्दे घरेलू कामगारो के साथ भी जुड़े है| उनकी भी संघर्ष की एक कहानी है जिसे हमे समझने की ज़रुरत है|

देश में पिछले पांच दशको में कई प्रयास हुए ताकि घरेलू कामगार महिलाओ के लिए एक कानून बन सके, पर घरेलू कामगारों को कामगार समझने में भी हमें एक लम्बा समय लगा | देश में सिर्फ आठ राज्य ऐसे है जो की उन्हें कामगारों की श्रेणी में रखते है और वहाँ उनके लिए कानूनों में संशोधन भी किया गया है | और ऐसे दो राज्य है ;महाराष्ट्र और तमिलनाडूद्ध जिन्होंने अलग से घरेलू कामगारों के कल्याण के लिए कानून भी बनाए है| घरेलू कामगारों को भी सम्मान के साथ काम का अधिकार होना चाहिए ये सरकार के साथ हमारी भी जिम्मेदारी है |

पिछले कुछ दिनों से हम लगातार गुरुग्राम और फरीदाबाद की बस्तियों में अलग अलग विषयो पर बात करने के लिए गुरुग्राम की हरिजन बस्ती में हमने घरेलू कामगार महिलाओ के साथ मिलकर एक मानचित्र बनाया जिसमे उन्होंने अपने साथ हो रहे सभी प्रकार के उत्पीड़न को चिन्हित किया |उत्पीड़न की जगहों के साथ इसमें ऐसी बहुत सी घटनाएं शामिल थी जिसे हम शारीरिक और यौनिक उत्पीड़न की श्रेणी में डाल सकते है इन सभी परेशानियों पर हमे बात करने की ज़रुरत थी और इस पर मार्गदर्शन ज़रूरी था |

अंतर्राष्ट्रीय घरेलू कामगार दिवस पर अपने ग्रुप के साथ हमने गुरुग्राम की स्थानीय समिति की अध्यक्ष श्रीमति अनुराधा शर्मा से मुलाक़ात करी | स्थानीय समितिए कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न (प्रतिरोधए प्रतिषेध और निवारणद्ध अधिनियम) 2013 के अंतर्गत बनी है| जिसका काम महिलाओ के लिए काम का एक सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करना है | इस समिति में असंगठित वर्ग की कामगार महिलाए अपनी शिकायत दर्ज करा सकती है | श्रीमति अनुराधा शर्मा ने बताया की महिलाएं किस स्थिति में अपनी शिकायते दर्ज करा सकती है, और किस प्रकार के कानूनी प्रावधान महिलाओ के पास उपलब्ध है | फरीदाबाद में उस दिन हमने एक बैठक का आयोजन किया जिस में हमने उनकी सामाजिक स्थिति पर बात करी | मार्था फेरैल फाउंडेशन और प्रिया संस्थाओं के द्वारा किये गए शोध में जो बाते सामने आयी थी, उन पर हमने चर्चा करी और इस स्थिति में सबकी भागीदारी के साथ हम कैसे काम करेंगे वो तय किया फरीदाबाद में ये हमारी पहली बड़ी बैठक थी जिसमे बहुत से घरेलू कामगार महिलाएं उनको परिवार के सदस्यों ने भाग लिया| चूँकि दिन खास था तो दोनों ही जगह पर सबने मुँह मीठा किया और एक दुसरे को बधाई दी | जब एकता है और एक दुसरे के प्रति संवेदना है, तो बाज़ार से खरीदे हुए गिफ्ट्स की क्या ज़रुरत है!

—प्रातिब मिश्रा

Facebooktwittergoogle_pluslinkedinrssyoutube
This entry was posted in Making Workplaces Safe. Bookmark the permalink.