हम सगी नहीं, पर पक्की बहनें हैं|

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(The title of the blog is a slogan often used by the women of Maharashtra-based Mahilla Rajsatta Andolan, which means that these women are not biological sisters, but have embraced a sisterhood of solidarity, mutual self-esteem, love and care. The blog speaks about the work of some of the nominees of Martha Farrell Award 2018 and how their work is realizing new meanings of women’s friendship and bonds, which are beyond patriarchal definitions of relationships affiliated to family and monogamous marriage.)

इतिहास ने अकसर औरतों को एक ही सांचे में ढाल कर दर्शाया है | औरतों को एक दूसरे की प्रतिद्वंद्वी की नज़र से देखा गया है, और जिन रिश्तों से वो माँ, बहन, बेटी या पत्नी के रूप में जुड़ती हैं, उन रिश्तों के अलावा, उनके और किसी भी रिश्ते को समाज की मान्यता प्राप्त नहीं है | ख़ासकर की वे रिश्तें, जो उनकी आपसी दोस्ती और एकजुटता को गहरा करते हैं, उन रिश्तों का तो इतिहास में कहीं भी ज़िक्र नहीं है | पर क्या सच में औरतें शादी या परिवार से परे किसी भी रिश्ते को निभा नहीं सकती?

पिछले महीने, मुझे राजस्थान के अलवर ज़िले में एक दिन बिताने का मौका मिला | यह काफी शांत इलाका है और जैसे ही आप अलवर शहर से बाहर निकलते है, तो अरावली श्रृंखला की सुन्दर पहाड़ियाँ आपका स्वागत करती हैं | इन पहाड़ियों की छोटी पतली गलियों से गुज़रते हुए, मैं एक गाँव में रुकी | वहाँ स्पेक्ट्रा नामक एक संस्था गाँव की औरतों को समूहों के माध्यम से एक साथ जोड़ रही है, ताकि वे मिल जुल कर अपने और अपने गाँव के विकास के लिए कुछ काम कर सकें | कहने को तो ये औरतें सगी सम्बन्धी नहीं हैं, एक दूसरे की पड़ोसी हैं | पर कोई पारिवारिक रिश्ता न होने पर भी, वे शायद एक दूसरे की सबसे ज़्यादा सगी हैं | जब खुद के परिवार इन औरतों के सपनें, प्रतिभाओं और कौशल को समझ नहीं पाते, तो वे एक दूसरे को प्रोत्साहित करती हैं और अपने घरों और गाँव के बंद दरवाजों से निकल, एक साथ अपने सशक्तिकरण के रास्ते तैयार करती हैं | जब वे साथ होती हैं, तो उन में सास-बहू, जात-धर्म और छोटे-बड़े का भेद नहीं होत| जहाँ परंपरागत सोच में औरतों को एक दुसरे की दुश्मन देखा गया है (ख़ास कर की सास बहु के रिश्ते में), वहीँ ये औरतें रोज़ इस सोच को झुठला रही हैं और साथ मिल कर पैसे जमा कर रही हैं, खेती कर रही हैं और अपने मवेशियों की देखभाल कर रही हैं | अपने साथ ये अपने गाँव को भी साथ ला रही हैं और एक नये समाज का निर्माण कर रही हैं |

अलवर से कोसों दूर, पश्चिमी उड़ीसा में रायगढ़ा का ज़िला है | किसी ज़माने में नक्सलवाद से ग्रस्त ये इलाका, आज विकास कर्मियों का प्रिय बन गया है | इन कर्मियों की नज़र में महिलाएं विकास का हिस्सा तो है, पर विकास की संचालक नहीं | इसी सोच के मध्य, रायगड़ा के चार गाँव की महिलाओं ने बहुत गहरी दोस्ती के रिश्ते बना लिये है | ये महिलाएं अपने आप को एकल महिलाएं बताती है, जो या तो शादी-शुदा नहीं है, विधवायें हैं या जिनके पति उन्हें छोड़ कर जा चुके हैं | यहाँ तक कि ऐसी महिलाएं जो शादी-शुदा हैं, पर अपने रिश्तों में अपने आप को अकेला पाती है, वे भी इस समूह का हिस्सा है | मार्था फैरेल अवार्ड 2018 की फाइनलिस्ट, भाव्या चित्रांशी ने, अपने एम.फिल के दिनों में, पाँच साल पहले इस काम को शुरू किया | आज ये औरतें, जिन्हें अकसर समाज और इनका परिवार नकार देता है (और कई बार प्रगतिशील विकास कर्मी भी), एक दूसरे के सुख-दुःख में साथ निभाती हैं; साथ में खेती कर अपना पैसा जुटा रही हैं; जब कोई बीमार पड़ जाये और परिवार वालों का साथ न हो तो उस औरत की तीमारदारी करती है या हॉस्पिटल ले जाती है; गाँव के पुरुष मुखियाओं की सत्ता पर संगीन सवाल उठा रही हैं और कभी कभी मिलकर जलसे भी करती है और आज़ादी का नाच भी | तो कैसे हुई ये औरतें एक दूसरे की दुश्मन ?

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महाराष्ट्र में स्थापित हुए महिला राजसत्ता आन्दोलन की औरतें अकसर कहती है, “हम सगी नहीं, पर पक्की बहनें हैं” | कौन है ये औरतें? महाराष्ट्र के 30 ज़िलों में रहने वाली ये औरतें, मिलकर, स्थानीय प्रशासन में, अपनी भागीदारी की पिछले 18 सालों से मांग करती आई हैं | पुरुषों के प्रभुत्व वाली राजनीति में ये औरतें, चुनाव लड़ने और जीतने की जुर्रत करती हैं और महिला हिंसा को प्रशासन का मुद्दा बनाती है | और ये काम ये औरतें अकेले हरगिज़ नहीं कर सकती | ये काम उन्होंने मिलकर किया है | जहाँ उन्होनें नीतियों में बदलाव क्रियान्वित करवायें हैं, वहीँ उन्होनें, अपने गाँव, परिवारों और मर्दों की सोच भी बदली है, ताकि बदलाव केवल ऊपरी ही नहीं, अंदरूनी भी हो | और हाँ, ये औरतें भी एक दूसरी की सगी नहीं हैं, पर तब भी एक हैं, दोस्त हैं, बहनें हैं और एक दूसरे की शुभ-चिन्तक हैं | इनका रिश्ता पक्का है, सहज है, दुनियादारी के परे है और अपने आप में एक बदलाव है |

इन्हीं औरतों की दृढ़ता, विश्वास और साथ को मार्था फैरल अवार्ड “उत्कृष्ट महिला सशक्तिकरण के लिये”, प्रत्येक वर्ष प्रोत्साहित करता है | इस अवार्ड के माध्यम से, ऐसी कई कहानियाँ निकल कर आती है, जहां पितृसत्तात्मक-पारिवारिक रिश्तों से परे, ये औरतें रिश्तों की परिभाषाओं को बदल रही हैं | अपने आपसी रिश्तों और दोस्ती के माध्यम से ये अपनी नयी पहचान भी बना रही हैं, अपने आप को सक्षम कर रही हैं और समाज का ढांचा बदल रही है | ये एक दूसरे का नया परिवार हैं, जिस में एक दूसरे का साथ ही सबसे बड़ा सच है; जहां इन औरतों की कीमत बच्चे पैदा करने और सदा नत मस्तक रहने पर निर्भर नहीं करती | जहां रिश्तें ही रिश्तों का मकसद है, आत्मनिर्भरता है पर तब भी एकजुटता है और पत्नी, बहन, बेटी और माँ के परे, खुद से खुद का रिश्ता है |

मार्था फैरल अवार्ड इन औरतों की बदलाव की कहानियों को सलाम करता है !

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