आवाज़ ऊठी नहीं तो, जुल्म और बढ़ता जायेगा

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“आवाज़ ऊठी नहीं तो, जुल्म और बढ़ता जायेगा”, ये अपने आप में एक ऐसा वाक्य है जो सदियों से हो रहे भेदभाव, हिंसा और गैर बराबरी की गवाही दे रहा है। 4 अप्रैल को ” वीमेन मार्च फ़ॉर चेंज” का आयोजन हुआ था, ये मार्च मंडी हाउस से जंतर मंतर तक था और इसका हिस्सा हज़ारों लोग बने, जिसमें महिलायें, पुरुष, ट्रांसजेंडर, गे, लेस्बियन, बच्चें, संगठित व असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाली महिलायें और कई गैर सरकारी संगठन भी शामिल थे। ये मार्च एक जवाब था पित्रसत्ता को, जो लगातर ये कोशिश करती है कि उनके होते हुए कोई भी तबका आगे न बढ़ सके। आज के दौर में ये महज़ कहने की ही बात है कि सब बराबर हैं, बल्कि सच तो ये है कि आज भी हम सब पित्रसत्ता की जकड़न में हैं। जवाब देने का तो हक़ सालों पहले से ही हमारे हाथ में नहीं था और आज जब सब जागरुक होकर सवाल उठा रहे हैं तो, तब भी उनसे ये अधिकार छीना जा रहा है।

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मार्च के बाद जंतर मंतर में ही, 3 घंटे का प्रोग्राम हुआ, जिसमें लोगों ने गाने, नृत्य, नारे के माध्यम से अपनी बातें रखी। औरतों ने बात रखीं कि कैसे उनका मानसिक और शारारिक शोषण होता है, कैसे उनको घर की चारदीवारी में कैद कर लिया जाता है। उन्होंने ये भी बताया कि औरतों की आज़ादी भी , नियम और कानून के साथ आती है, वो नियम और कानून कभी कपड़ो के रूप में, तो कभी समय के रूप में थोपे जाते हैं। औरतें अगर नौकरी भी कर रही हैं तो, समाज उनके चरित्र पे सवाल उठाता है और अगर वो इस से भी बच जायें तो वो अपने कार्यस्थलों में यौन उत्पीड़न की शिकार होती हैं।

कई लोगों ने अपने अनुभवों को भी बताया कि कैसे बचपन से ही पित्रसत्ता ने उनका बचपन छीना और कैसे किसी न किसी रूप में वो उन पर हावी रहा। एक महिला ने बताया कि “बचपन में स्कूल की पढ़ाई और खेल कूद पे पहरा था, तो शादी के बाद घरेलू जिम्मेदारियों ने मेरे विकास को रोक रखा था, लड़का पैदा करने का दबाव था साथ ही घर के किसी भी फ़ैसले में निर्णय लेने का कोई हक़ नहीं था, मैं ना चाहते हुए भी पित्रसत्ता की गुलाम थी।”
महिलाओं ने सरकार की तरफ भी इशारा किया और कहा कि ” बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” तो एक अहम मुद्दा है ही, पर बेटी को आज़ादी दो, बेटी को सुरक्षा दो, बेटी को स्वास्थ दो, ये भी अहम मुद्दा है। आज के समय मे बस एक चीज़ पे काम करकर, हम विकास की बात नहीं कर सकते, विकास एक पूरा ढांचा है, जिसमे हर वर्ग, हर तबका, हर जेंडर का होना ज़रूरी है।

“वीमेन मार्च फ़ॉर चेंज” जैसे आयोजन एक ऐसा उदाहरण हैं जहाँ औरतें खुल के अपने बात को रखती हैं और अपने मुद्दों पे लड़ती हैं और समाज को ये आगाह करती हैं कि अब वो किसी भी तरह का जुल्म नहीं सहेंगी चूंकि अब वो उठ चुकी हैं। किसी भी चीज़ से लड़ने के लिए ज़रूरी है कि हम व्यक्तिगत तौर पे सबसे पहले उस से लड़े क्योंकि अपनी आवाज़ हमें खुद बनना होगा। इस मार्च का भी यही मकसद था कि हम आगे बढें और खुद को साबित करें और ये स्थापित करें कि पित्रसत्ता की बेड़ियो के अंदर अब हम नहीं हैं, हमने हमारी नींव रख दी है, जो की किसी से भी लड़ने के लिए बहुत मजबूत है।

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