Antar-Goonj (The Inner Echo)

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(Praatibh Mishra from our team expresses through a poem, the everyday struggle of a domestic worker in a metropolitan city. In times of rapid urbanization and stark class divides, domestic workers are often subjected to abuse, insults and surveillance. This is compounded by the sexual harassment they face on the streets and at their workplaces. Through his poem, Praatibh not just brings out the injustice that they face every day, but also their determination to survive and to lead a life of dignity.)

मैं हर रोज सड़क पर, अपना मुँह ढक कर काम पर निकलती हूँ
ताकि मुझे तुम्हारी नज़र न लग जाये
अंधे बेहरों की तरह बिना किसी आहट के जल्दी से निकल जाती हूँ
ताकि मुझे तुम्हारी नज़र न लग जाये

रोज़ाना तुम्हारे सामने अपनी झोली खोल कर दिखाती हूँ
गार्ड साहब,
ताकि मेरे सम्मान और खुदरी पर तुम ऊँगली न उठा सको
ताकि मेरी ईमानदारी के तुम भी गवाह बनो

मैडम, क्या तुम्हे पता है, अक्सर तुम्हारी हर उखड़ी बात को
ज़मीन पर बैठ कर चाय के साथ निगल जाती हूँ मैं

क्यूंकि शहर में सब कुछ महंगा है
और काम आसानी से नहीं मिलता

उस बच्ची को पिंजड़े में गुमसुम होते देखा है मैंने
मैंने उसमे खुद को गुमसुम होते महसूस किया है
इस बड़े शहर की भीड़ में
मैं गुमसुम और गुमनाम जरूर हूँ,
पर जिन्दा हूँ मैं |
मैं हर रोज जीती हूँ अपने बच्चो के कंधो पर लदे अपने सपनो को बढ़ता देखकर
मैं खुश होती हूँ उन सपनो को साकार होता देखकर
ये सोचकर की एक दिन ये सब बदलेगा |

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2 Responses to Antar-Goonj (The Inner Echo)

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