केस ऑफ़ मिस्सिंग लोकल कमिटी – स्थानीय समिति को खोजने का हमारा अनुभव

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LC, local committee, स्थानीय समिति ! भारत के हर जिले में स्थानीय समिति का होना ज़रूरी है, ऐसा हमारे देश में बने एक कानून और उसको बनाने वाले लोगो का विचार था | साल 2013 में  राजनीतिक दबाव के चलते, महिलाओ का कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध एवम प्रतितोष ) अधिनियम पास हो गया | इस कानून के मुताबिक देश में सभी कार्यस्थलो (जहाँ 10 से ज्यादा व्यक्ति काम करते है) में आतंरिक समिति का गठन और सभी जिलो में ज़िला अधिकारी के नेतृत्व में एक स्थानीय समिति का गठन किया जाना था | स्थानीय समिति का काम है, सभी असंगठित कामगार महिलाओ को यौन उत्पीड़न और उससे जुड़े कानून के बारे में जागरूक करना, उसके पास आयी हुई सभी शिकायतों का निवारण करना और ज़िला स्तर पर इस कानून को लागू करवाना | इस कानून के अस्तित्व में आने के 4 साल बाद भी जब इन समितियों की कुछ खबर नहीं थी| हमने पता लगाना शुरू किया कितनी समितियों का देश में गठन हुआ और वो कैसे काम कर रही है|

अगर कानून है, कागज़ों के मुताबिक समितिया है और सरकार इस मुद्दे पर संवेदनशील है (जो की महिलाओ के मुद्दे पर हमेशा ही होती है) तो ज़रूर कुछ अच्छा काम ज़मीनी स्तर पर भी हो रहा होगा | हालात को समझने के लिए हमने पहले कागज़ों में इन समितियों को ढूढना शुरू किया, और बाद में सरकारी दफ्तरों में जा कर उन्हें खोजने का प्रयास किया| हमारी तफ्तीश ने हमे सरकार की व्यवस्था को और करीब से समझने का मौका दिया |

इस कानून के मुताबिक वो ज़िला मजिस्ट्रेट या अतिरिक्त ज़िला मजिस्ट्रेट या कमिश्नर कोई भी ज़िला अधिकारी हो सकता है जिसकी नियोक्ति प्रदेश सरकार द्वारा होती है| आजकल सभी कुछ इन्टरनेट पर मिल जाता है, पर सरकार की किसी भी वेबसाइट पर हमे इस समिति की जानकारी नहीं मिली| जिस समिति का गठन ही न्याय दिलाने के लिए हुआ था, उस तक अपनी शिकायत के साथ पहुँचना इतना मुश्किल भी हो सकता था ये हमे नहीं पता था | सोचिये, जो महिला सड़क पर अपना रोज़गार चला रही है वो किस तरह से इस समिति तक अपनी शिकायत ले जा सकती है, जब किसी को इस समिति के बारे कुछ पता ही नहीं है | जब कोई भी जानकारी हमे कागजों या दफ्तरों से नहीं मिली तो हमने ज़िला अधिकारी का पता लगाना शुरू किया, और हमारी मुलाकात ज़िला मजिस्ट्रेट के दफ्तर में उनके असिस्टेंट से हुई जिन्होंने हमे बताया की ऐसी कोई समिति है तो पर उन्हें फाइल देखनी पड़ेगी | तीन अलमारियों में कुछ देर खोजने के बाद एक फाइल मिली, धूल झाड़कर उसके दसवे पन्ने पर वो कागज़ मिला जिसकी हमे तलाश थी | इस पन्ने को खोजने में हमे करीब 3 महीने लग चुके थे | वो पन्ना सरकार का नोटिफिकेशन था, जिसके द्वारा ये सूचना लायी गयी की इस ज़िले में कौन स्थानीय समिति का सदस्य है | नोटिफिकेशन में 4 महिलाओ का नाम लिखा था, पहली नज़र में सवाल ये उठा कि ये समिति में कुछ कमी है क्योकि इसमें कोई भी पुरुष सदस्य नहीं था पर फिर भी कुछ न होने से तो अच्छा ही होगा | अस्सिटेंट साहब से हमने ये भी पूछ लिया की इस समिति का ऑफिस कहाँ है? जवाब तो नहीं मिला पर नसीहत मिल गयी की नोटिफिकेशन को ध्यान से देखो वही से कुछ पता चलेगा | अस्सिस्टेंट साहब के बताये अनुसार हमने गौर से उस नोटिफिकेशन को पढ़ना शुरू किया- उसमे 4 महिलाओ का नाम था, उनकी उपलब्धिया थी और एक सदस्य का घर का पता था |

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स्थानीय समिति में कोई एक सदस्य सरकार से भी होता है, तो हमने सबसे पहले उनका पता लगाना ठीक समझा | जिस कार्यालय में वो कार्यरत थी वहां हम चले गये, और उनके बारे में पूछना शुरू किया | पहले दो व्यक्तियों ने तो कह दिया यहाँ इस नाम की कोई महिला काम नहीं करती | उसके बाद हमे एक और महिला मिली जो की कुछ वर्षो से उस दफ्तर में काम कर रही थी उन्होंने हमे बताया की जिन्हें हम खोज रहे है उनका तबादला तो एक साल पहले ही हो चुका है, इस समय उनकी जगह कोई और कार्यरत है | हमने उनसे भी बात करी इस विषय में पर उन्हें कोई जानकारी नहीं थी |  4 में से अब 3 सदस्य बचे थे, जिनसे हमे कुछ उम्मीद थी | लेकिन उन्हें ढूँढना इतना आसन नहीं था | पहला नाम जो की चेयर पर्सन का था, वो एक संस्थान से रिटायर हो चुकी थी और उनके नाम के साथ बस इतनी ही जानकारी मौजूद थी | दुसरे नाम के आगे बस सोशल वर्कर लिखा था और उनके घर का पता था जो की गलत भी हो सकता था | तीसरे नाम के साथ एक संस्था का नाम भी लिखा था जो की हमारे लिए सबसे अहम जानकारी थी उस समय, हमने उस संस्था के बारे में इन्टरनेट द्वारा पता लगाया और वही से हमे पहला फ़ोन नंबर मिला, जिसके ज़रिये हम आगे बढ़ सकते थे|

फ़ोन पर समझाना मुश्किल था, तो हमने उनका समय लिया और उनके पास चले गए | वहां जिनसे हम मिले उन्हें इस कानून के बारे में जानकारी तो थी पर उन्हें स्थानीय समिति जिसकी वो सदस्य थी उसकी पूरी जानकारी नहीं थी | पिछले एक साल से वो इस समिति की सदस्य थी पर इस दौरान उनकी बाकी सदस्यों से कभी मुलाकात नहीं हुई| वो समिति की चेयरपर्सन को जानती थी पर इस विषय में उनसे भी कभी कोई बात नहीं हुई थी| उनके मुताबिक उनको ये भी नहीं पता था की कौन कौन सदस्य है इस समिति में | उनका मानना था की कभी कोई केस आयेगा तो स्थानीय विभाग या ज़िला अधिकारी द्वारा उन्हें सूचित किया जायगा | अब तक हमे ये तो समझ आ गया था की यह समिति बस कागज़ों में बन सकी है, हकीक़त में ये है ही नहीं| हमे उन सदस्या से ये जानकारी तो मिली की इस समिति की चेयरपर्सन कौन है| उनसे मिलना हमारे लिए बहुत ज़रूरी था और वही से हमारी तफ्तीश ख़तम होंने वाली थी |

हमने समिति की चेयरपर्सन को फ़ोन किया और उनसे समय मांगा, व्यस्तता के चलते उन्होंने हमे 3-4  दिन के बाद का समय दिया| वहां जा कर पता चला की असल में सरकार अब एक लिस्ट तैयार करती है उन लोगो की जो समिति सदस्य बन सकते है उस लिस्ट में उनका भी नाम है तो ऐसी समिति बनाने के वक़्त हमे वो सूचित कर देते है पर इसके आलावा हमे जानकारी नहीं होती की आगे क्या करना है| अब तक हमारी खोज को भी 4 महीने हो चुके थे, जिसमे हमारी मुलाकात 4 में से 2 सदस्यों से हुई, 1 सदस्य का तबादला हो चुका था और अंत तक आते आते भी हमे नहीं पता चला की चौथी सदस्य कौन थी| जिस समिति तक पहुचने में हमे 4 महीने लग गए उस तक असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाये कैसे पहुच पाएंगी? कैसे कोई केस इन समितियों तक पहुचेगा ? कैसे न्याय अपनी जगह बना पायेगा ? शायद हमारे देश में ऐसे ही ज़्यादातर व्यवस्थाए चल रही है| इस कानून के अंतर्गत सभी जिलो में इन समितियों का सुचारू रूप से चलना अनिवार्य है| जिसके मुताबिक इन समितियों का काम सिर्फ शिकायत लेने तक सीमित नहीं है पर कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का रोकथाम भी एक महत्वपूर्ण काम है | पूरे जिले में यौन उत्पीड़न के विषय में जागरूकता फैलाना भी इन्ही समितियों का काम है जो कही भी नहीं हो रहा |

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