खेलों द्वारा लड़के.लड़कियों की सोच में बदलाव

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हम गुरमीत कौर और टेम्पा हांसदा प्रो स्पोर्ट्स डेवलपमेंट (Pro Sport Development) में स्पोर्ट्स ट्रेनर के पद पर कार्य कर रहे हैं | हमने मार्था फैरेल फाउंडेशन और प्रिया के कदम बढ़ाते चलो (KBC) प्रोग्राम में (जनवरी 2017 से मई 2017 तक) 8 राज्यों में 12 स्थनों के 345 युवाओं जिनमें 179 लड़कियों और 166 लड़कों के साथ काम किया | कदम बढ़ाते चलो का उदेश्य सार्वजनिक स्थानों में महिला हिंसा को रोकना हैं और युवाओं और युवतियों में सामंजस्य और समता लाना है|

इस उदेश्य को पूरा करने हेतु हमने 12 स्थनों पर लड़के – लड़कियों के साथ स्पोर्ट्स कैंप लगाया जिसमें सारे खेलों को लड़के – लड़कियों ने साथ मिलकर खेला | आमतौर में, एक उम्र के बाद लड़कियों को खेलने-कूदने से रोका जाता है और उनकी स्वतंत्रता और शरीरों पर पाबंदियां लगा दी जाती हैं | और लड़कों को भी यही लगने लगता है की लड़कियां खेलने-कूदने में सक्षम नहीं हैं और वे भी कभी भी उन्हें अपने साथ शामिल नहीं करतें | किशोरावस्था तक लड़कियों और लड़कों के बीच के फ़र्क इतने प्रत्यक्ष और निश्चित हो जाते हैं की कब ये जेंडर भेदभाव और हिंसा का रूप ले लेतें हैं| ये शायद इन लड़के और लड़कियों को कभी पता ही नहीं चलता |

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इस भेदभाव और लड़के-लड़कियों में जो एक दुसरे को लेकर गलतफहमियां हैं, इन्हें खत्म करने के लिये हम मार्था फैरेल फाउंडेशन और प्रिया के साथ मिलकर खेल के माध्यम से युवाओं को साथ ला रहे हैं | हमारे खेलों का उदेश्य उनमें आपस में जान – पहचान कराना, बातचीत करना, एक साथ टीम में काम करना और उनको एक लीडर के रूप में कार्य करने के लिए तैयार करना है, जिससे कि हम जेंडर असमानता के भाव को कम कर सकें और लडकें – लड़कियों को एक साथ सहज महसूस करा सकें और उनकी सोच में परिवर्तन ला सकें |

खेलों के माध्यम से हमने इन उदेश्यों को बहुत ही आसानी से पूरा किया और साथ ही उनके स्वयं के बदलाव देखे जैसे उनका आत्मविश्वास बढ़ना, एक दूसरे को प्रोत्साहित करना और हर कार्य को साथ मिलकर करना | युवाओं से बातचीत करने पर हमने महसूस किया कि खेलों के माध्यम से युवा खुद भी अपने स्वयं के बदलाव महसूस कर रहे थें क्योंकि लडकें-लड़कियां खेल खेलते हुए एक – दूसरे के नाम जान रहे थे| प्लानिंग के लिए एक साथ बातचीत कर रहे थे और खेल को जीतने के लिए एक दूसरे का सहयोग और प्रोत्साहन कर रहे थे और इन बदलावों को वे अपने निजी जीवन में भी को लागू कर रहे थे |

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हमने यह महसूस किया कि खेलों के माध्यम से हम अपनी बातों और सोच को दूसरों तक आसानी से पहुँचा सकते हैं | युवाओं की सोच में परिवर्तन आना और उनका आत्मविश्वास बढ़ना, यह स्वभाव बहुत ही स्वभाविक होता जा रहा था जो कि महिला हिंसा को रोकने के लिए बहुत ही लाभदायक रहा है | एक दुसरे के साथ खेलने के वक़्त उन्हें ये पता चलता है की न सिर्फ दोनों एक दुसरे के साथ काम कर सकते हैं, पर एक दुसरे से कम भी नहीं हैं; की जो भी सामाजिक असमानताएं उनके बीच हैं वे केवल समाजिक ही हैं उनका कोई प्राकृतिक तर्क नहीं हैं | लड़कों की यह समझ में आता है कि लड़कियां शारीरिक रूप से कमज़ोर नहीं और लड़कियों को यह समझ में आता है की लड़कों में भी भावनाएं हैं | दोनों समाज द्वारा बनी हुई नियम-क़ानून तोड़कर अपनी शक्तियों और कमजोरियों को समझ पाते हैं और साथ में काम करतें हैं | और आगे चलकर यही सशक्त और जागरूक युवा अपने समुदायों में बदलाव की चिंगारी सुलगाते हैं |

–गुरमीत कौर और टेम्पा हांसदा

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