महावरी में शर्म कैसी!

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”अब तुम बड़ी हो गई हो।”

”कितनी बार मना किया है कि अब बाहर मत खेलों, खास कर लड़कों के साथ।”

”कितनी बार कहा है कि बिना दुपटटे के बाहर मत जाया करो।”

10-12 साल की उम्र में जैसे बिन मौसम बरसात की तरह, हम ये सभी सवाल एक छोटी सी लडकी पर डाल देते है और सोचते है कि वह एक दिन में ही सब समझ जाऐगी । पर क्या हम यह खुद समझ पाये है कि बडे होने का वास्तविक मतलब क्या है ? क्या यह एक शारिरिक प्रक्रिया है? या फिर यह मानसिक विकास से भी जुडी है ?और क्या इसका सामाजिक ,सांसकृतिक और राजनीतिक कारणों से भी संबंध है?

आमतौर पे माहवारी (menstruation) या प्रजनन स्वास्थ्य (reproductive health) संबंधित किसे भी मुददे पर खुलेआम बात करने मे हर कोई झिझकता है । इसे एक संकोच का विषय माना जाता है, जो महिलाओं और लडकियों की लाज- शर्म से भी जुडा हुआ है । यहाँ तक की महिलाएं और लडकियाँ इस पर आपस में भी बात करने से संकुचाती है, क्योंकि उनको शुरू से यही सिखाया जाता है कि यह एक गुप्त /निजी बात है इस पर सबके साथ यानि कि publicly बात करना वर्जित है।

हमारा समाज पितृसतात्मक समाज है, जहाँ पर औरतों और लडकियों के शरीर पर अनेको नियम और कानून बना दिये गए है । पितृसतात्मक समाज की संरचना को बनाए रखने के लिए औरतों  और लडकियों की यौनिकता नियंत्रित करना अनिवार्य है । तो उनके उठने- बैठने से लेकर उनके प्रजनन स्वास्थ्य संबंधित फैसलों तक, प्रत्येक पहलु पर सीमाएं खडी कर दी गई है। उनके शरीरों को शर्म का मुद्दा माना जाता है और माहवारी या किसी भी प्रजनन स्वास्थ्य संबंधित विषय पर छुप्पी लगा दी जाती है।

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फलस्वरूप महिलाएँ और लडकियाँ अपने शरीरों और महावरी सम्बंधित जानकारी से वंचित रहती है। उनकी स्वतंत्रता , इच्छाओं और अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध लगा दिये जाते है और अगर वो इस पर कभी बात करना भी चाहें तो वो उपहास का और प्रश्नों का प्रात्र बन जाती है।

यह वंचन यहीं तक सीमित नही है। चुँकि महावरी (और प्रजनन स्वास्थ्य) पर खुलेआम बात करने में इतनी बाधाएं हैं, तो यह सरकार, न्यायिक व्यवस्था, स्वास्थय-अधिकारियों और समाज के लिये कभी भी चिंता का विषय नहीं बनता। अतः महिलाओं और लड़कियों को ना सिर्फ जानकारी के अभाव का सामना करना पड़ता है, बल्कि वे माहवारी संबंधित स्वास्थय और स्वच्छता से भी वंचित रहती हैं।

हाल ही में Goods and Service Tax (GST) की सूचि में Sanitary Napkins पर 2‐5% कर (tax) की कटौती की गई हैं। वहीं दुसरी ओर सिंदूर या चुड़ियों पर किसी भी तरह का कर नहीं हैं। कंडोम भी कर-मुक्त हैं और इसका तर्क यह है कि संभोग एक प्राकृतिक जरूरत है और इस जरूरत की पूर्ति हेतु कंडोम अनिवार्य है, पर सरकार शायद यह भूल गई हैं कि माहवारी भी एक प्राकृतिक क्रिया हैं, जिसके लिय Sanitary Napkins अनिवार्य है।

इससे यहीं साबित होता है कि एक पितृसत्तात्मक व्यवस्था में महिलाओं और लड़कियों की जरूरतों को प्राथमिकता नही दी जाती हैं। इन अभावों की वजह से महिलाओं और लड़कियों पर अनगिनत शारिरिक और मानसिक दबाव हैं, जिसकी वजह से माहवारी जैसी प्राकृतिक प्रक्रिया भी एक बहुत बड़ा बोझ बन जाती है।

तो इस बोझ को दूर करने के लिये और इस चुप्पी को तोड़ने के लिये, 2014 से, प्रत्येक वर्ष, 28 मई को विश्व माहवारी स्वच्छता दिवस (World Menstrual Hygiene Day) मनाया जाता हैं। इस दिन, महिलाओं और लड़कियों की माहवारी संबंधित सभी समस्याओं और चुनौतियों पर विस्तृत चर्चा होती है और इन समस्याओं और चुनौतियों का समाधान भी खोजा जाता हैं। तो अगली बार जब हम किसी छोटी लड़की को यह बोले कि तुम बड़ी हो गई हो, तो हमें यह याद रखना होगा कि कही इस बड़प्पन के साथ उसके लिये जीवन-भर का संघर्ष शुरू ना हो जाये।

-देबोश्री, नेहारिका, प्रातिभ, यशवी

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