क्या महिलाओं के प्रति हो रही हिंसा केवल सामाजिक व्यवस्था की देन है?

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अंतराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर 10 मार्च 2016 को मुझे राजकीय संग्रहालय, झांसी में आयोजित कार्यक्रम में भाग लेने का अवसर प्राप्त हुआ। कार्यक्रम का आयोजन मार्गश्री, मार्था फैरल फांउडेशन एवं प्रिया संस्था द्वारा किया गया था। कार्यक्रम के दौरान युवाओं के उत्साह को देखकर बहुत अच्छा लगा। इस अवसर पर मैंने अपने सम्बोधन में निम्नलिखित बातों पर ज़ोर दिया। अपने सम्बोधन के कुछ अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहा हंू। आशा करता हंू कि आप भी इस वास्तविकता से इत्तेफाक रखते होंगे।

यदि महिलाओं को अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों को रोकना है तो उन्हें शिक्षित होना होगा, उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना होगा, हमारा सामाजिक परिवेश इसके लिए उत्तरदायी है, महिलाओं का उत्पीड़न सबसे अधिक महिलाओं द्वारा ही किया जाता है, असमानता की भावना हमारे परिवारों से ही शुरू होती है, हमें देखना है कि महिलाओं को कैसे समानता का अधिकार मिले, जो कानून बने हैं उन्हें सख्ती से लागू करना होगा, स्त्री शक्ति का, देवी का रूप है उसे अपनी शक्ति और अपने अधिकारों के प्रति सजग होना होगा, आदि-आदिश्।

आप सोच रहे होंगे कि इसमें नयी बात क्या है, यह तो हम रोज सुनते भी हैं और जानते भी हैं। महिलाओं के प्रति हो रही हिंसा को रोकने के लिए यही तो करने की आवश्यकता है।

लेकिन क्या हम सही हैं? क्या यही सब पर चर्चा करने से महिलाओं के प्रति हो रहे अत्याचार रूक जाऐंगे? क्या हम व्यक्तिगत रूप से कभी अपने भीतर झांक कर देखते हैं? क्या हम यह जानते हैं कि वे कौन से छोटे- छोटे कदम हैं जिन्हें लेने से हम एक बड़े सामाजिक बदलाव की नींव रख सकते हैं? हम सब यह भली-भांति जानते हैं कि यदि हमें कोई बदलाव लाना है तो उसका प्रारंभ हमें अपने आप से करना होता है, लेकिन हमारी कोशिश हमेशा दूसरों को बदलने की होती है। और यही हम सब की वास्तविकता है।

क्या आप अपने घर में तथा सार्वजनिक स्थानों पर बोलचाल के दौरान गाली देते हैं? क्या आपने सोचा है कि आपके इस व्यवहार से आपके आसपास बच्चों तथा महिलाओं को कैसा लगता है? कभी अपनी लड़की, बहन, पत्नी, माँ आदि से पूछियेगा। यदि वे सब पुरूषों के इस व्यवहार से घर में और सार्वजनिक स्थलों पर असहज महसूस करती हैं तो अपने इस व्यवहार को बदलिऐ। यह बहुत आसान है।

क्या आपको अपने कार्यालय में, बस में, ट्रेन में, बाजार इत्यादि में महिलाओं को, लड़कियों को घूरना अच्छा लगता है। माफ कीजिएगा लेकिन आपमें से शायद कुछ लोग इसे आँख सेकना भी कहते होंगे। आज घर जाकर अपनी लड़की, बहन, पत्नी, माँ आदि से पूछियेगा कि उन्हें कैसा लगता है? शायद आपका यह व्यवहार कल से बदल जाये।

इस प्रकार न जाने कितनी ही छोटी-छोटी बातें हैं जिन पर हम गौर नहीं करते पर हमारे एक कदम से हम कितना बड़ा बदलाव लाने की काबलीयत रखते हैं यह हम नहीं जानते।

क्या अब भी आपको लगता है कि महिलाओं के प्रति हो रही हिंसा केवल सामाजिक व्यवस्था की देन है? अपनी प्रतिक्रिया जरूर व्यक्त करें और इस बदलाव का हिस्सा बनें।

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