मेरे अनुभवों की कार्यशाला

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दिनांक 22/04/2018 से 24/04/2018 तक कदम बढ़ाते चलो कार्यक्रम के युवाओ के लिए राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित कार्यशाला, अंतरगूंज-बदलाव की आवाज़ का मैं हिस्सा बना|

अंतरगूंज सिर्फ एक कार्यशाला न होकर एक ऐसा मंच है जो युवाओं को एक अवसर प्रदान करता है कि युवा अपने समाज एवं समुदाय में व्याप्त लिंग आधारित भेदभाव पर अपनी प्रतिक्रिया को स्वतंत्र रूप से वयक्त कर सके, खुद की भावनाओ को समझने और उसे व्यकत करने का प्रयास करे व उन सभी कलाओं को सीखे जिनसे वह अपने भविष्य को एक सकारात्मक आयाम दे सके|

इस कार्यशाला का हिस्सा बनने के बाद मैंने बहुत कुछ नया अनुभव किया एवं सीखा|

अंतरगूंज कार्यशाला काफी प्रभावशाली थी इसका अनुभव मैंने तब किया जब इस कार्यशाला के दौरान मैंने अलग अलग किरदारों को निभाया. जैसे: मेरी सुबह की शुरुआत एक खेलकूद प्रशिक्षक के रूप में होती थी जहा मैंने युवाओं को प्रोत्साहन से परिपूर्ण खेल गतिविधियाँ करवाई|

दिन के सभी सत्रों में मैंने एक फोटोग्राफर की भूमिका निभाई जहा मैंने करीब से सभी प्रतिभागी युवाओं के चेहरों पर उभरते सभी प्रकार के भावों को स्पष्ट रूप से देखा – “कभी हँसते हुए, कभी सोच में डूबे, कभी उलझन में तो कभी सवालों भरा चेहरा. इसी के साथ मैंने एक प्राथमिक चिकित्सक की भूमिका भी निभाई और शाम होते ही एक प्रबंधक जो यह सुनिश्चित करता है की सभी प्रतिभागी समय पर अपने-अपने कमरों की और प्रस्थान करे ताकी अगले दिन के लिए उन्हें विश्राम का मौका मिले|

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अपने दैनिक जीवन में हम कुछ इसी तरह अलग-अलग किरदार निभाते हुए विभिन्न कार्यो को पूर्ण करते दिखाई देते है| दैनिक जीवन के इस चक्र में हमने कुछ कार्यो के बीच अंतर करना शुरू कर दिया है और उनको छोटे और बड़े हिस्सों में विभाजित कर दिया है| जैसे: माली, चपरासी, चोकीदारी इत्यादि छोटे परन्तु दफ्तर वाले बड़े कार्य होते है, और ऐसी धारणा बना ली है की जिसका जो काम है वो ही करेगा या करेगी|

ऐसी सोच नहीं होनी चाहिए क्यूँकि हर एक कार्य और उसे करने वाले दोनों ही महत्वपूर्ण होते है. अगर हम कोई भी कार्य करते है तो हमेशा कुछ न कुछ नया सीखते है और हमे भी उस कार्य की एहमियत का पता चलता है| अगर हम छोटी सोच रखते है तो उस कार्य को करने का एवं उससे कुछ सीखने का मौका खो देते है|

इस कार्यशाला के माध्यम से मैंने यह सीखा है कि कम से कम मैं अपने अन्दर कार्यो को लेकर होने वाली इस भेदभाव की भावना को पनपने ना दूँ|
और यह मेरी अंतरगूंज थी|

कदम बढ़ाते चलो कार्यक्रम के अंतर्गत मैं एक सामुदायिक खेल ट्रेनर के रूप में KBC युवाओं को खेल के माध्यम से संचार, लीडरशिप, टीम वर्क, प्लानिंग एवं आर्गेनाइजेशन जैसे महत्वपूर्ण जीवन-कौशल के बारे में बताता हूँ| ऐसे जितने भी सत्र आयोजित होते है उनका लिखित विवरण का दस्तावेज़ बना कर संरचित करना एवं उनका फोटो भी खीचना होता है. जर्रूरत के समय अगर मैं निसंकोच इन कार्यो का दायित्व लूंगा तो इससे मुझे कुछ नया सिखने को मिलेगा एवं इन कार्यो को लेकर आत्मनिर्भर भी हो जाऊंगा| आगे चलकर मैं यह भी चाहूँगा कि मैं खेल ट्रेनर के साथ एक जेंडर ट्रेनर का रूप भी इन सत्र में निभा सकूं!

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