Metro ki Wild Safari

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Being frequent metro riders, Yashvi Sharma and Deboshree Mohanta reflect from their experience that why men are still complaining about the women-only compartment in the Delhi Metro.

2002 में मेट्रो की जब शुरुआत दिल्ली में हुई, तो बहुत से दिल्ली वालो ने राहत की सांस ली क्योंकि मेट्रो के आ जाने से घंटो का सफ़र आरामदायक बन गया था और सड़कों पर बढ़ रहे ट्रैफिक से भी छुटकारा मिल रहा था| बहुत ही साधारण किराये में चंद मिनटों में लोग एक जगह से दूसरी जगह पहुँच पा रहे थे, प्रदूषण से दूर और वातानुकूलित ट्रेन में सफ़र करने का मौका मिल रहा था| दिल्ली के लिए यह किसी उपलब्धि से कम नहीं था|

हमारे कॉलेज के दिनों में भी मेट्रो ने बहुत साथ दिया| हमारे सफ़र को आरामदायक और सुरक्षित बना दिया था | जैसे-जैसे मेट्रो की पहुँच पूरी दिल्ली में फैलने लगी, वैसे-वैसे मेट्रो में भीड़ भी बढने लगी| इस भीड़ के कारण महिलाओं को शोषण का शिकार भी बनना पड़ा| समय के साथ शोषण के मामले और भी बढ़ने लगे | जब ये शोषण के मामले सरकार तक पहुँचें, तो सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए मेट्रो में एक डिब्बा सिर्फ उनके के लिए आरक्षित किया और जनरल डिब्बे में भी कुछ सीटे उनके लिए अलग से आरक्षित की |

पर, क्या मेट्रो में महिलाओं को आरक्षण देने से उनका शोषण होना कम हुआ ?

Women-coach-in-delhi-metro

महिलाओं के लिए डिब्बा अरक्षित करने के कारण, बहुत से पुरुषों के पुरुषत्व को ठेंस पहुँची| उन्हें यह बात समझने में परेशानी हुई की क्यों सिर्फ महिलाओं को यह विशेषाधिकार दिया जा रहा है और वे यह मानने लगते है की जनरल डिब्बों पर सिर्फ पुरुषों का अधिकार है| इसी कारण महिलाओं का जनरल डिब्बे में सफ़र करना बहुत पुरुषो को खटकने लगा| भीड़ के समय जब कोई महिला पुरुषों से दूर हो कर खड़ा होने को कहती है तो उन्हें अक्सर यह सुनने को मिलता है की “इतनी ही परेशानी हो रही है तो आप महिला वाले डिब्बे में क्यों नहीं जाती?


महिलाओं के लिए परेशानिया यहीं खत्म नहीं होती| भीड़ का फायदा उठाते हुए, कई बार महिलाओं के शरीर को गलत तरीके से छूते है और बार-बार घूरते है, ग्रुप बना कर घेर लेते है, अभद्र आवाजें निकालते है, धक्का देते है, पिंच करते है, कमेन्ट कसते; और हद्द तो तब हो जाती है जब पुरुष महिलाओं का शोषण करने के लिये अपने गुप्त अंग का इस्तेमाल करते है|

इन सबसे छुटकारा पाने के लिए जब वे आरक्षित डब्बे में जाती है तो उन्हें वहा सांस लेने की जगह भी नहीं मिल पाती| जगह की कमी के कारण, चिपक कर खड़ा होने पर मजबूर हो जाते है| आम महिलाएं तो फिर भी इन परेशानियों को झेल लेती है, पर गर्भवती और छोटे बच्चों के साथ सफ़र करने वाली महिलाओं की मुसीबत दुगुनी हो जाती है|

महिलाओं के लिए मेट्रो में सफ़र करना किसी वाइल्ड सफारी से कम नहीं है| वाइल्ड सफारी में तो सिर्फ जंगली जानवरों का खतरा होता है, जबकि मेट्रो में महिलाओं को अपनी गरिमा पर चोट पहुँचने का डर होता है जो कई बार उनके शारीरिक और मानसिक स्तर पर प्रभाव छोड़ जाती है|

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