तरीकें असंख्य, उद्देश्य एक

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27 मार्च, 2019 को मार्था फैरल अवार्ड तीन साल का हो जाएगा । हर साल की तरह, इस साल भी, इस अवार्ड के माध्यम से एक ऐसे व्यक्ति और एक ऐसी संस्था को पुरस्कृत किया जायेगा, जिन्होनें जेंडर-समानता के क्षेत्र में बहुमूल्य योगदान दिया है । अवार्ड के इन तीन सालों में न सिर्फ विजेताओं की कहानियाँ उभर कर आयी हैं, बल्कि बाकी प्रत्याशियों की भी अवार्ड में अहम् भूमिका रही है । इन तीन सालों में, 222 व्यक्तियों और 183 संस्थाओं ने अपने नामंकन दर्ज करें हैं । यह प्रत्याक्षी भिन्न-भिन्न तरीकों या प्रणालियों के माध्यम से काम कर रहें हैं, पर इनका उद्देश्य केवल एक ही है, कि जेंडर समानता को समाज में एक वास्तविकता बनायें । इन प्रत्याशियों की भिन्नता और प्रतिबद्धता ही मार्था फैरल अवार्ड को सार्थक बनाती है और मार्था के समाज को जेंडर-समान बनाने के सपने को पूरा करती है ।

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इस साल के प्रत्याशियों की कहानियाँ भी अनूठी हैं और उनके दृढ़ संकल्प को दर्शाती हैं । अरनालु मिनियाका एक 40 वर्षीय कोंध आदिवासी महिला है, जो रायगड़ा, उड़ीसा में रहती है । अरनालु एक एकल महिला है, जो पिछले 6 वर्षों से अपनी जैसी एकल महिलाओं को अपने गाँव और आस पास के गाँवों में एकजुट कर रही हैं; ये एकल नारियों का संगठन समाज की पितृसत्तात्मक (patriarchal) संरचना को नकारते हुए अपने लिए एक नई वास्तविकता तैयार कर रहा है । दिल्ली की रेशमा हमेशा से संगीत की शौक़ीन थी । पर अपने आस-पड़ोस और समुदाय में महिलाओं और लड़कियों के साथ हो रही हिंसा और भेदभाव को बदलना भी चाहती थी । रेशमा ने अपने संगीत को अपने नारीवाद के साथ जोड़ा और मंज़िल मिस्टिक्स की स्थापना की, जहाँ संगीत के माध्यम से यौनिकता (sexuality) और प्रजनन स्वास्थ्य (reproductive health) जैसे संवेदनशील मुद्दों पर बहुत सहजता से चर्चा होती है ।

29 वर्षीय डोली पिछले 6 साल से ऐसी महिलाओं के साथ काम कर रही है, जो महिला हिंसा से पीड़ित हैं या उस से गुज़र चुकी हैं । जो आत्मविश्वास और गरिमा, महिलायें लम्बे समय तक हिंसा से पीड़ित होने की वजह से खो देती है, डोली उसी आत्मविश्वास और गरिमा को वापिस लाने में उनका सहयोग करती हैं, ताकि वे हिंसा से सही मायने में उभर सकें । 35 वर्षीय मनु गुलाटी दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पढ़ाती हैं और ऐसे पढ़ाने के तरीकें इस्तेमाल कर रही हैं, जिस से ज़्यादा से ज़्यादा लड़कियाँ स्कूलों में पढ़ सकें और अपनी शिक्षा जारी रखें । कोटा, राजस्थान की हेमलता गाँधी महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना चाहती है; अपनी इसी कोशिश में हेमलता ने 100 महिलाओं को ऑटो-ड्राइवर के रूप में तैयार किया है और ऑटो खरीदने में लोन-सम्बंधित सहयोग भी दिया है ।

जहाँ एक तरफ अरनालु, रेशमा, डोली, मनु और हेमलता की कहानियाँ हैं, वहीं दूसरी और हमारे “सर्वश्रेठ संस्था” के प्रत्याक्षी हैं, जिनका काम जेंडर समानता के लिये हो रहे प्रयासों में नयापन ला रहा है । मुंबई, महाराष्ट्र की कोरो इंडिया दलित, आदिवासी, मुस्लिम और एकल महिलाओं के सशक्तिकरण के लिये 30 साल से काम कर रहा है । यही दलित, आदिवासी, मुस्लिम और एकल महिलायें, जिनके साथ कोरो काम कर रहा है, संस्था की सीनियर मैनेजमेंट और गवर्निंग बोर्ड का भी हिस्सा हैं । दिल्ली की क्रिया संस्था एक नारीवादी मानवाधिकार संस्था है, जो महिलाओं, लड़कियों और नॉन-बायनरी लोगों के यौनिक अधिकारों की वकालत करता है । क्रिया की खुद की टीम में भी वही महिलायें नज़र आती हैं, जिनके अधिकारों के लिये संस्था कार्यरत है । पुणे, महाराष्ट्र की इक्वल कम्युनिटी फाउंडेशन (ई.सी.एफ़) युवा लड़कों का सक्षमीकरण करती है, ताकि वे आगे चलकर अपने रोज़मर्रा के जीवन में जेंडर समानता को उतारे । ई.सी.एफ़ की टीम के लोग भी संस्था के साथ काम करते हुये अपने आप में कई बदलाव पाते है, जिनकी वजह से वे अपने जीवन में जेंडर के प्रति संवेदनशील बन पाए हैं ।

अजमेर, राजस्थान की महिला जन अधिकार समिति (एम.जे.ए.एस) खेल और टेक्नोलॉजी के माध्यम से ऐसी लड़कियों का सशक्तिकरण करती है, जिनका जल्द/बाल/जबरन विवाह होने का खतरा है । जिन लड़कियों का सशक्तिकरण एम.जे.ए.एस करती आई है, आज वही लड़कियाँ संस्था का संचालन कर रही हैं । गरियाबंद, छत्तीसगढ़ की लोक आस्था सेवा संस्थान (लास) दलित और आदिवासी महिलाओं का सशक्तिकरण तो कर ही रही है, पर साथ ही साथ खेल के माध्यम से, समुदाय के पुरुषों के साथ भी काम कर रही है ताकि वे जेंडर भेदभाव को समझे और ख़त्म करें । बेंगलुरु की मल्टी-नेशनल कंपनी, एम्फेसिस अपने कार्यस्थल में ऐसी नीतियों और प्रणालियों का क्रियान्वन कर रहा है, जिस से कार्यस्थल में जेंडर समानता, सुरक्षा और गरिमा का माहौल बन रहा है ।

27 मार्च, 2019 को, यूनेस्को हॉल, दिल्ली में, तीसरे मार्था फैरल अवार्ड समारोह में, हम इन प्रत्याशियों की विविधता, सामर्थ्य और प्रतिबद्धता को सम्मानित कर रहे हैं । भले ही प्रत्येक वर्ष अवार्ड के केवल दो विजेता होते हैं, पर अवार्ड के ये तीन साल प्रत्याशियों की कहानियों के बिना संभव न हो पाते, जो यह साबित करते हैं कि जेंडर समानता तक पहुँचने के लिये कोई एक रास्ता या तरीका नहीं है । अपने भिन्न-भिन्न परिवेशों में काम करने वाले ये प्रत्याक्षी, मार्था के जैसे, अपने नये तरीकों से एक नये भविष्य की और रास्ते प्रशस्त कर रहे हैं और एक नई वास्तविकता की परिकल्पना तैयार कर रहे हैं ।

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