वो 3 दिन

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‘कदम बढ़ाते चलो’ एक ऐसा मंच है जहा लड़के और लड़कियां साथ मिलकर महिला हिंसा के विरुद्ध आवाज़ उठाते है| चाहे वह जेंडर आधारित हिंसा हो, योन उत्पीडन, घरेलू हिंसा, सामाज की रुढ़िवादी सोच, भ्रूण हत्या, आदि, इन सभी विषयों पर युवा खुद चर्चा करते है और इन सब परेशानियों को ख़त्म करने की रणनीति बनाते है| के.बी.सी. के अंतर्गत युवाओं को ‘फ्रीडम टू प्ले’ स्पोर्ट्स कैंप से जोड़ते है फिर धीरे-धीरे युवाओं में नेतृत्व उभर के आता है| ‘जेंडर थ्रू स्पोर्ट्स’ में खेल का बहुत महत्त्व है, स्पोर्ट्स एक मजबूत टूल है जिससे खेल-खेल के माध्यम से जेंडर से सम्बंधित जुड़े हुए तमाम रुढ़िवादी सोच और प्रथाओं पर चर्चा करते है| कुल 319 लड़के और लड़कियों ने इस ट्रकार्यक्रम में भाग लिया आगे बढके खुद 1305 युवाओं को जेंडर के मुद्दो से वाकिफ किया 5 स्थानों में 5 राज्यों से|

बहुत अच्छा लगता है जब लड़के और लड़कियों एक साथ मिलकर खेलते है| उन्हें खेलता देख महसूस होता है जैसे की इन्हें समाज के बन्धनों से मुक्ति मिली है और हमारे इस छोटे से 3 दिन के कार्यक्रम में आकर चैन की सांस लेते है|

उनमे वह उल्लास दिखता है जो शायद स्कूल या घर के वातावरण में नहीं दिखता| पहले दिन तो चुप-चाप से, सहमे हुए से, डरे से होते है की कही कुछ ऐसा ना बोल दे जिससे वापस अपने घर जाकर डाट पड़े| डर इस बात का था की साथ वाला उसकी बातों को ध्यान से तो नहीं सुन रहा| लेकिन जैसे-जैसे खेल की और जेंडर से सम्बंधित चर्चा आगे बढती है युवा खुलने लगते है| सवाल पूछते है की “समाज में इतनी कुप्रथाए क्यूँ है, लड़कियों को क्यूँ आगे बदने नहीं देते, अगर सुरक्षा का मुद्दा इतना बड़ा है तो हम अपने घरो में छुप कर क्यों रहते है, कुछ करते क्यूँ नहीं है?”

इन्ही सब सवाल-जवाब में 3 दिन निकल जाते है, लेकिन जो किस्से सुनने को मिलते है वह बहुत ही रोमांचक होते है| इश्क के किस्से नहीं, लेकिन समाज की वो सोच जो एक लड़की को इतना छोटा महसूस कराती है की वह अपनी इच्छाएं खुद ही अपने अन्दर चूर-चूर कर देती है| दिल्ली की लड़की अगर यह सोचे की उसे आगे चलकर इंजिनियर बनना है, तो घरवाले कितना गर्व महसूस करते है, जी-जान से मेहनत करके पैसे जुटाते है ताकि कोई कमी ना रह जाये| बड़े शेहरो में युवा एक बार भी सोचने से नहीं कतराते की पैसा कहा से आयेगा, वो जानते है की लोन ले सकते है, स्कॉलरशिप की मदद से पढ़ सकते है, खुद कुछ साल काम करके पैसा इक्कट्ठा करके आगे पढ़ सकते है| लेकिन छोटे शहर में एक लड़की के लिए ये सोचना की स्कूल के बाद पड़ना है, किसी दिल के दौरे से कम नहीं है| आर्थिक परेशानी को अलग रखा जाये तो ये समझ में आया की उनके आस-पास के लोग ही कुछ करने नहीं देते| घर में यही चिंता होती है की बस किसी तरह शादी करवा दे लड़की की और इस “लड़की” नामक झंझट से छुटकारा मिले जीवन भर के लिए| किसके पास इतना समय है की लड़की को पढाये और समाज की भी सुने?

मैं दिल्ली की निवासी हूँ, बचपन से यही पली-बड़ी | आजतक किसी ने मेरे चरित्र को लेके कुछ नही कहा| लेकीन पन्ना में एक मासूम लड़के ने बड़े प्यार से बोला “मैडम, आपका चरित्र बहुत अच्छा है|” ये सुनते ही मैंने बोला की तुम्हे कैसे पता चला की मेरा चरित्र कैसा है? वह बोला, “मैडम आप कितने अच्छे से बात करती हो, आपके माता-पिता ने आपको पन्ना आने का मौका दिया| आप इतना चौक क्यूँ रही है, मैंने कुछ भी बुरा नहीं बोला है|” ये सुनते ही मुझे महसूस हुआ की यहाँ कोई मुझे जानता तक नहीं है, फिर भी मेरे चरित्र को भाप रहे है| इन कुछ दिनों में मुझे कितना समझ लिया होगा जो मेरे चरित्र पर टिपण्णी कर रहे है| इसका मतलब ये हुआ की यहाँ की लड़कियों को हर पल इससे जूझना पड़ता होगा| कार्यशाला में उपस्थित लड़कियों ने बताया की अगर वो भी मेरी तरह बहार आएँगी उन्हें नकारात्मत सोच का सामना करना पड़ेगा| शायद वो मेरी तरह अपने घर की चौखट कभी नहीं लांघ सकती|

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जब लड़की ये महसूस कर लेती है की घर वाले ही ऐसा सोचते है, तो बाहर वाले को गाली देके क्या होगा| वो खुद को भी एक झंझट ही समझने लगती है| घर वाले इतना तो ख्याल रखते है की कपडे ढंग से पहने है या नहीं, मेहमान आते ही आँखें नीची रहती है या नहीं, लडको के सामने कितनी ज़बान चलती है, लेकिन कही ये नहीं सोचते की वो खुश है या नहीं| जो सोचने की और कुछ कर दिखने की आज़ादी मिलती है, वो चंद रुपयों, गहनों से, शादी से या नए कपड़ो से नहीं मिलती| ऐसा नहीं है कि परिवार वाले ही लड़की के एकलौते दुश्मन है, लेकिन ये समाज एक परिवार को इस कदर निंदा करती है और दबाव डालती है कि परिवार वाले भी मजबूर हो जाते है अपनी इज्ज़त बचाने के लिए| तब एक परिवार की इज्ज़त के आगे एक छोटी सी लड़की की इच्छा फीकी पढ़ जाती है| समाज में रहना भी है, इज्ज़त भी बचानी है, लड़की को अशुद्धि से बचाना है और जात-पात पर भी आंच नहीं आने देना है|

क्या यह सब काफी है जीने के लिए?? नहीं|

‘कदम बढ़ाते चलो’, वो मंच है जहा युवा खुल्कर अपनी बातों को सबके समक्ष रख सकते है| महिला हिंसा को समझ सकते है और उसके विरुद्ध खड़े हो सकते है| इसी सोच को और आगे बढ़ाते हुए, मार्था फैरल फाउंडेशन 3 दिन की कार्यशाला आयोजित करता है जो युवाओं में महिला हिंसा रोकने के नेतृत्व को आगे बढाने में मदद करता है और उन्हें कई नयी कौशल देता है ताकि वह आगे चलकर एक अच्छे नेता की तरह उभरे और उन तमाम मुद्दें में काम करे जिससे समाज डरती है और डराती है|

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