आशाओं का उत्सव- महिला दिवस

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मैंने कई सालों से ये ग़ौर किया है कि महिला दिवस को छोड़कर अन्य विशेष दिनों जैसे कि ‘यूथ डे’ या ‘मेन्स डे’ का थीम हमेशा कुछ ऐसा होता है जिसमें बेहतर समाज की कल्पना की जाती है- यूथ या मैन के ज़रिए। पर, महिला दिवस हमेशा एक पहचान की बात करता, स्वयं के भीतर के बदलाव की बात करता है, एक संवेदनशीलता की बात करता – महिलाओं के लिए , उनके ज़रिए नहीं।

आखिर क्यों? शायद, इतने सालों से भी हम महिलाओं के प्रति वो पहचान, वो संवेदनशीलता स्थापित नहीं कर पाए इसलिए महिला दिवस ‘महिलाओं का न होकर, महिलाओं के लिए’ ज़्यादा  है।

एक अजीब से होड़ देखी है मैंने- पहचान दिलाने की, स्ट्रांग वीमेन का ठप्पा लगाने की। इस होड़ में शायद हम भूल चुके है व्यक्तिगत परिभाषा के महत्व को।

मैंने जितनी भी बातें ऊपर लिखी वो मेरे अनुभव है- जो मैंने देखा है, सुना है और महसूस किया है। इन बातों की पुष्टि मेरे हरिजन बस्ती, गुरूग्राम की महिलाओं के साथ हुए पिछले एक महीने के संवाद से की जा सकती हैं।

जिसमें मैंने शशक्तिकरण को नए नज़रिये से देखा। अलग- अलग राज्यों से ताल्लुक रखने वाली, अलग भाषाएँ बोलने वाली महिलाओं जिनसे मेरी कभी छोटी और कभी काफ़ी लंबी बातचीत हुई। ज़्यादातर की बातों से ये साफ झलका की वे अपने बच्चों को एक बेहतर भविष्य देना चाहती है जिससे ताकि वे इस गरीबी के चक्र से बाहर निकलर कुछ अलग और बेहतर करें।

सुलेखा, 42 वर्षीय महिला जो पिछले 12 साल से हरिजन बस्ती में एक कमरा लेकर अकेली रह रही है और अपने कमाए हुए पैसों से अपनी बेटी को बैंगलोर से नर्सिंग की पढ़ाई करवा रही है। उनका कहना है कि “बस कुछ दिन और कि बात है, बेटी की पढ़ाई पूरी ही जाएगी फिर वो अच्छी नौकरी करेगी और मैं भी यहाँ से वापस अपने गाँव बंगाल चली जाउंगी”।

ठीक ऐसे ही, सोमा अपने 2 बच्चों की पढ़ाई कलकत्ता में इंग्लिश मीडियम स्कूल में करा रही है। सोमा भी पिछले 10 साल से बस्ती में रह रही है, वैसे वो आई तो अपने पति के साथ थी पर 2 साल साथ रहने के बाद अचानक एक दिन उनके पति गायब हो गए और आजतक उनकी कोई ख़बर नहीं आई।  सोमा का कहना है कि “हिम्मत तो टूट गया था जब पति लापता हुए थे, मुझे समझ नहीं आ रहा था यहाँ रहूँ या वापस जाऊ। पर फिर दोनों बच्चों का ध्यान आया और बस वहीं सोचकर मैं रुक गई और तबसे यहाँ घरेलू सहायक बन कर काम कर रही हूँ ताकि बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल जाये।”

प्रिया और मार्था फॉरेल फाउंडेशन के प्रोजेक्ट “सपने मेरे, भविष्य मेरा” के माध्य्म से हरिजन बस्ती, गुरूग्राम में रहने वाली महिला घरेलू कामगारों के लिए एक रिसोर्स एंड सपोर्ट सेंटर की स्थापना की जा रही है- जो कि इन महिलाओं को हर तरह की जानकारी से परिचित करेगा  और साथ ही किसी भी तरह के बातचीत के लिए एक सुरक्षित जगह सुनश्चित करेगा।

इसी सेंटर के सिलसिले में नीड असेसमेंट सर्वे के दौरान बहुत सारी महिलाओं से बात हुई और ‘स्ट्रॉन्ग विमेन’ को परिभाषा को लगातार बदलते देखा या यूं कहूँ की उभरते देखा।

इस दौरान ये बात साफ थी कि कई बार हम अपनी कल्पनाओं को दूसरों पर बस यूं ही थोप देते है क्योंकि हमें लगता है ये ही सही है, जबकि सही होने से ज़्यादा ज़रूरी होता है सहभागिता का होना।

इसके बाद, 8 मार्च, 2021 को हरिजन बस्ती गुरूग्राम में महिलाओं और उनके बच्चों के साथ महिला दिवस- “आशाओं का उत्सव” मनाया गया। बस्ती की कई महिलाओं ने इसमें हिस्सा लिया। मेडिकल जाँच और कानूनी परामर्श के साथ साथ महिलाओं ने हरिजन बस्ती के मैप पर अपने अपने घरों को ढूंढने का खेल खेला। इसके साथ ही उन्होंने कैनवास पैंटिंग – ‘आशाएं कैनवास पर’ के कार्यक्रम में हिस्सा लिया। रंग और उमंग का ऐसा तालमेल कम ही देखने को मिलता है- महिलाओं ने कैनवास पर खुद से जुड़ी चीज़ों को बनाया। किसी ने अपना घर बनाया, किसी ने दुकान, किसी ने अपने बच्चें और किसी ने खुद को बनाया। ज़्यादातर के लिए पेंटिंग बिल्कुल नया अनुभव था। कुछ महिलाओं ने कहा कि- “हमारे मन में तो बन रहा है जो हम बनाना चाहते पर इस मोटे कागज़ पर कैसे बनाए समझ नहीं आ रहा।” कुछ के लिए ये दुबारा बचपन को जीने जैसा था।

कार्यक्रम के बाद महिलाओं ने शेयर किया कि उन्होंने एक बेफिक्री और ख़ुशी के साथ पैंटिंग की और वे अपने साथ एक साझा खूबसूरत अनुभव लेकर जा रही है।

महिला दिवस के मायने कई सारे हैं, सबके लिए अलग भी हैं। ठीक उसी तरह कला के रूप ढेरों है और शशक्तिकरण हर बार नए तरह से उजागर होता है, इसकी परिभाषा बदलते रहती हैं नए नए अनुभवों के साथ|

 

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