कोरोना से नहीं, लॉकडाउन से डर लगता है

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रात के बाद सवेरा ज़रूर होता है पर सवेरे के बाद रात भी ज़रूर आती है। 2021 में कोविड माहमारी ने एक बार फिर से लोगों को हद से ज़्यादा असहाय किया है, बुनियादी चीजों के लिए तड़पाया है। ये रात फिर से हो गई जिस रात में सब बहुत घुट रहे हैं। इनमें एक तबका ऐसा भी है जो केवल एक तरह से नहीं बल्कि कईं तरीकों से घुट रहा है- बीमारी, बेरोज़गारी और भूखमरी। ये तबका घरेलू कामगारों का है।

इस बार का तो लॉकडाउन अलग है पिछले साल से।”

अरे मैडम, क्या अलग है? मुश्किल तो उससे ज़्यादा ही हो रही हैं। पिछले साल थोड़ा तो जमा किया हुआ पैसा था, जिसका इस्तेमाल कर पाए थे। इस बार तो अब तक कर्ज़ ही उतार रहे थे कि फिर से सब दोबारा हो गया। दो दिन का लॉकडाउन पहले किया अब तो बढ़ता ही जा रहा है।”

ये बात रजनी ने फोन पर बताई। रजनी अपने दो बच्चों और पति के साथ नारायणा गांव में रहती है। वो दिल्ली उन्हीं सपनों के साथ आई थी, जिन सपनों के साथ लाखों की तदाद में प्रवासी मज़दूर आते हैं- रोज़गार और बच्चों की शिक्षा। इस महामारी के दौरान ये दोनों चीज़ें इनकी पहुंच से बेहद दूर हैं।

नीलम जो उत्तराखंड से 8 साल पहले दिल्ली आयी और काम मिलने के बाद यहीं बस गई। नीलम का कहना है कि “हां मेरा राज्य बहुत खूबसूरत है पर वहां भी मज़दूरी ही करनी पड़ती थी, हम तो पढ़े लिखे नहीं है मगर चाहते है कि बच्चें पढ़-लिख लें। यहां दिल्ली में मैं आस-पास की 3 कोठियों में काम करती थीं। उन्होंने मुझे 15 अप्रैल को ही हटा दिया। पिछले साल भी हटाया था पर लॉकडाउन के बाद बुला लिया था, इस बार क्या करेंगे नहीं पता।”

अपनी आर्थिक स्थिति का ज़िक्र करते हुए नीलम ने बताया की “राशन की कमी के कारण हमलोग एक टाइम ही खाना खा रहे हैं।” नीलम से बातचीत के दौरान सबसे ज़्यादा दुःखी मुझे उसकी हंसी ने किया। मेरे सवाल पूछने पे मुझे खुद पर गुस्सा आया कि आखिर मैंने क्यों पूछ दिया ऐसा?

मैंने नीलम से पूछा कि- क्या आपके पास सैनिटाइजर है?

ये सुनकर नीलम बहुत तेज़ हंसी और बोली “आप क्या मज़ाक कर रहे हो? मैं चावल नहीं खरीद पा रही हूं, सैनिटाइजर कैसे ख़रीद सकती हूं?”

बीते हुए कुछ दिनों में कम से कम 40 महिला घरेलू कामगारों से बेशक मेरी बात हुई पर ताज्जुब तो इस बात का है कि उन सबके संघर्ष एक से ही हैं। संघर्ष एक साल पहले भी यही था और शायद 5 साल पहले भी या उससे पहले भी।

ज़्यादातर महिलाएं 5-6 वर्षों से नौकरी कर रही हैं पर बचत के नाम पर उनके पास शून्य रुपये हैं। स्वास्थ्य और सुरक्षा के नाम पर उनके पास बूंद भर जानकारियां हैं। महिला सशक्तिकरण को सच्चाई बनाने के लिए तमाम योजनाओं ने दम तोड़ दिया है।

बात हो दिल्ली के महिला कामगारों की या गुरुग्राम की महिला कामगारों की सब इस समय में भयानक परिस्थितियों से गुज़र रही हैं।

अपने घर की एक मात्र कमाने वाली अखलीमा (घरेलू कामगार, हरिजन बस्ती, गुरुग्राम) का कहना है कि “मेरे पति 2 साल पहले ही छोड़ कर चले गए थे, मुझ पर 3 बच्चों की ज़िम्मेदारी है- जिसमें सबसे छोटा बच्चा 5 साल का है। नौकरी छूटने के बाद सब कुछ बिखर गया है, कुछ समझ नहीं आ रहा कि खाएं तो कैसे खाएं? घर तो अब कोई रहा नहीं, जो है सो यही है।”

इस कठिन समय में सही जानकारी तक पर्याप्त पहुंच न होने के कारण उन्हें न तो कोविड टीकाकरण का पता चल रहा है और न ही बीमारी के लिए किसी सरकारी योजना का।

हरिजन बस्ती, गुरुग्राम से ही बसंती ने बताया कि “टीकाकरण लें तो आखिर लें कैसे? ऑनलाइन रेजिस्ट्रेशन एक झमेला है। कब से प्रयास कर रहें हैं पर हो ही नहीं रह। लगता है ये वैक्सीन हमलोग के लिए है ही नहीं।”

इन घरेलू कामगारों की बस्तियों में बहुत शोर है, ये शोर उनकी परेशानियों का है पर एक अजीब से चुप्पी भी है। एक ऐसी चुप्पी जिसमें डर है नौकरी के छूट जाने का और दोबारा न मिलने का, एक ऐसी चुप्पी जो शायद कोविड के दर्द को भी घोट रही है क्योंकि शायद भूख और बेरोजगारी का दर्द उससे कई गुना बड़ा है।

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