मिसिंग केस ऑफ लोकल समिति- पार्ट 2

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कार्यस्थल पर महिलाओं को यौन उत्पीड़न से सुरक्षा सुनिश्चित कराने वाले कानून को बने 9 वर्ष हो गए हैं। ये कानून 2013 में लागू हुआ था। इस कानून की एक मुख्य बात ये है कि ये हर कामकाजी महिला की सुरक्षा की बात करता है, चाहे वो संगठित क्षेत्र में काम करती हों या असंगठित क्षेत्र में। जिस भी कार्यस्थल में 10 या 10 से अधिक लोग कार्यरत हैं, वहां आंतरिक समिति (इंटरनल कमिटी) का गठन होना ज़रूरी है। ठीक उसी तरह, हर जिले में स्थानीय समिति (लोकल समिति) का गठन होना भी जरूरी है। ताकि जो महिलाएं असंगठित क्षेत्र में काम कर रही हैं या 10 से कम कार्यकर्ताओं वाले संस्था में काम कर रही हैं या फ्रीलांस या कंसलटेंट के तौर पर काम कर रही हैं- वो लोकल समिति में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के बारे में शिकायत दर्ज करा सकती हैं।

आपकी जानकारी के लिए – लोकल समिति में कोई भी महिला कार्यस्थल से जुड़े यौन उत्पीड़न की शिकायत कर सकती है। अगर कोई महिला अपनी आंतरिक समिति के निर्णय से संतुष्ट नहीं है तो वो भी यहां आ सकती है।

इसी लोकल समिति के बारे में तफ़्तीश हमने दोबारा शुरू की। आपको ये बता दें कि 3 साल पहले भी मार्था फॉरेल फाउंडेशन ने लोकल समिति का पता लगाने के लिए हर कोशिश की थी। (पुराना ब्लॉग यहां पढ़े लिंक)

तो, इस बार भी लोकल समिति को ढूंढना एक बहुत बड़े मिशन जैसा रहा, जिस दौरान कई लोगों से मुलाकात हुई। वो इस ब्लॉग का अहम हिस्सा हैं, उनके ज़िक्र के बिना ये ब्लॉग अधूरा होगा।

सबसे पहले हमने इंडिया के डिजिटल बन जाने की उपलब्धि का इस्तेमाल किया। वैसे तो आजकल सब कुछ इंटरनेट पर मिल जाता है, ठीक उसी सब में हमें एक पीडीएफ फ़ाइल मिली जिसमें दिल्ली के 9 जिलों (हालांकि 11 जिले हैं) में गठित हुए लोकल समिती का पता और लैंडलाइन नंबर दिया हुआ था। हमने तफ़्तीश की शुरुआत लैंडलाइन नम्बर घुमा कर की, 9 में से 3 जिलों में फोन लगा (बाकियों में किसी ने उठाया ही नहीं या तो कॉल इंगेज आता रहा)। जिन जिलों में फोन लगा उन्होंने लोकल समिति को पहचाना ही नहीं, जब हमने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की समिति बोला तो उन्होंने चौंकाने वाले जवाब में कहा – “हां यौन उत्पीड़न समिती थी तो, पर कहां बैठती है ये मुझे नहीं पता। आप एक काम करें फलाना को कॉल करें, ये नम्बर हैं।” जब हमने फलाना को कॉल किया तो वे भी कुछ खास नहीं जानते थे और बाद में फोन करें बोल कर कॉल रख दिया। हमें डिजिटली कुछ खास जानकारी नहीं मिली।

सिंतबर 2021 में डिजिटल तफ़्तीश के बाद, अक्टूबर में हमने हर एड्रेस पर फिजिकली जाने का सोचा। हमारे इस मिशन में हमारे फील्ड एनिमेटर भी शामिल थे, जो कि दिल्ली के अलग अलग जिले में काम करते हैं। शुरुआत में, फील्ड एनिमेटर जिले की डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट कार्यालय में गए, उनमें से एक भी एनिमेटर को कोई जानकारी नहीं दी गई। वो पूरा दिन ऑफिस का चक्कर लगाते रहे और इस कमरे से उस कमरे घूमते रहे पर उन्हें लोकल समिति के बारे में कुछ पता नहीं चला। नार्थ दिल्ली की फील्ड एनिमेटर को तो 800 रुपए सिर्फ उस सरकारी पीडीएफ में लिखे एड्रेस तक पहुंचने में लग गए (कोई घरेलू कामगर, या सब्जी की रेरी लगाने वाली कैसे इतना खर्च कर के बस शिकायत करने जाएगी?)। उसके बाद उन्हें ये जानकारी मिली कि अभी इस समिति को भंग किया गया है, आपके पास अगर शिकायत है तो आप जिले के वन स्टॉप सेंटर में जाएं (राहत की बात तो ये थी कि वहाँ समिति होने का सबूत तो मिला पर आश्चर्य ये हुआ कि क़ानून में तो वन स्टॉप सेंटर का ज़िक्र ही नहीं है तो वहाँ शिकायत कैसे की जा सकती है?)।

इसके बाद नवंबर के महीने में मैंने और मेरी सहकर्मी ने इस तफ़्तीश को आगे बढ़ाया। दिल्ली की 11 जिलों में से हमें बस एक (साउथ-ईस्ट दिल्ली) में लोकल समिति के बारे में जानकारी मिली। बाकी जिलों के अलग अलग क़िस्से हैं, जो कानून बनने और उसके लागू होने के भयंकर गैप को दर्शाते हैं। किसी जिले में ‘पॉश’ कानून को ‘पॉक्सो’ कानून समझा गया, किसे जिले में हमें हिदायत दी गई कि पुलिस के पास शिकायत करो। एक ज़िले में तो एक साहब ऐसे मिले जिन्होंने हमसे कहा “लोकल समिति ढूंढ रहे, बताओ कहां बनवानी है?”।

दिसम्बर के महीने में हमें पता लगा कि 9 दिसम्बर को इस कानून के 9 साल पूरे होने पर सभी सरकारी विभागों में इस कानून की जागरूकता के लिए ट्रेनिंग हुई है और लोकल समिति के गठन के लिए नोटिफिकेशन भी पास हुआ है।

लोकल समिति के विषय में जानकारी के लिए एक सरकारी दफ़्तर की ओर जाने का रास्ता

जनवरी और फरवरी में एक नए उम्मीद और विश्वास के साथ हमने इस तफ़्तीश को और आगे बढ़ाया। नोटिफिकेशन पास तो ज़रूर हुआ था पर हमें कही दिखा नहीं। हमने लोकल समिति के बोर्ड्स भी ढूढ़ने की कोशिश की पर सिवाय साउथ दिल्ली जिले के ये बोर्ड हमें कहीं नजर नहीं आया।

आपकी जानकारी के लिए- इस कानून के तहत लोकल समिति के सभी सदस्यों का नाम और नंबर डिस्प्ले होना चाहिए।

तो, इस बार हमें 11 जिलों में से 6 जिलों में लोकल समिति की जानकारी मिली – कहीं आधी तो कहीं उससे थोड़ी ज़्यादा। कुछ जिलों के अधिकारीयों ने हमसे कहा कि “हां यहां समिति तो है पर आप हैं कौन आपको क्यों जानकारी दी जाए?” हमारे ये बताने पर कि हम इस जिले में काम करते हैं और समिति की जानकारी पब्लिक इनफार्मेशन है तो फिर उन्होंने हमें लेकर थोड़ी गंभीरता दिखाई और कहा कि “अगर शिकायत है तो आप फलाने कमरे में शिकायत डाल दें हम लोकल समिति के नाम और नम्बर नहीं दे सकते वो पर्सनल डिटेल्स हैं।” इसके बाद तो हम जागरूकता की कमी देख कर चौक से गए।

नई दिल्ली जिले में लोकल समिति का डिस्प्ले बोर्ड ढूंढ़ते हुए

एक कार्यालय में हमारी मुलाकात SDM से हुई, उन्होंने बताया कि उनके जिले में लोकल समिति है और वे बहुत प्रशिक्षित हैं। फिर, हमने पुछा कि क्या लोकल समिति घरेलू कामगर महिला की शिकायत लिखने में उनकी मदद करेगी तो उन्होंने जवाब दिया कि लोकल समिति के मेंबर्स इतने फ्री नहीं होते, उस महिला को खुद शिकायत लिखनी होगी। हमने उनसे पूछा कि वो महिला अगर लिख नहीं सकती तो थोड़ी चुप्पी के बाद उन्होंने कहा कि ये तो देखना पड़ेगा। यहां बात ये नहीं है कि समिति उनकी मदद नहीं करेगी बल्कि बात तो ये है कि हम कहते तो हैं ये कानून सबके लिए है पर क्या वाकई ये सबके लिए है, ये एक बड़ा सवाल है?

एक ज़िले के लोकल समिति के सदस्यों से बात-चीत करने के बाद ये पता लगा कि उनमे से एक सदस्य दिल्ली में रहते ही नहीं हैं. ऐसे में सवाल ये उठता है कि अगर किसी केस को लेकर असंगठित क्षेत्र की महिला आए तो क्या सभी सदस्यों की मौजूदगी ज़रूरी नहीं ?

ऐसा नहीं है कि हमारे मिशन में हमें मददगार लोग नहीं मिले, बिल्कुल मिले जिन्होंने हमें जानकारियां दीं जिससे हमें आगे बढ़कर लोकल समिति को ढूंढने में मदद मिली। कुछ लोकल समिती के मेंबर्स से बात भी हुई, जिनमें से आधे से ज्यादा को हमारे फोन करने के बाद पता चला कि वो कमिटी के मेंबर हैं। एक दो ऐसे मिले जिन्हें अपनी जिम्मेदारियां तो पता थीं पर वे इस बात से चिंतित थे कि जिला अधिकारी के कार्यालय से उनकी कोई ट्रेनिंग नहीं हुई है, उनका कोई इन्वॉल्वमेंट नहीं है।

जहां समितियां बनी थीं, वहां नोटिफिकेशन दिखाने वाले/या बिना दिखाए बस मुंह से बताने वाले अफसरों ने कहा कि यहां काफ़ी समय से लोकल समिति है। हो सकता है, वहां समिति हो पर जिस समिति तक पहुंचा ही नहीं जा सकता उसका होना और न होना एक जैसा ही है।

इस पूरे 6 महीने के मिशन में एक बात तो तय है कि अभी भी ये कानून बस कागज़ो पर ही है। और बात की जाए, असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाओं की तो सुरक्षित कार्यस्थल अभी भी एक सपना जैसा ही है। इस सपने को पूरा करने के लिए हम सब को नींद से जागने की ज़रूरत है।

मिशन अभी भी जारी है- मिसिंग केस ऑफ लोकल समिति की।

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