हिंसा हमारे समाज का वह पहलू है जो अक्सर अदृश्य रहता है क्योंकि इसे हम सब ने “सामान्य” मान लिया है। कभी घर में, ससुराल में ,कभी स्कूल में, कभी सड़क पर और अब डिजिटल दुनिया में हिंसा के अनेक रूप हमें रोज़ दिखाई देती हैं। लेकिन जब यह हिंसा लैंगिक असमानता पर आधारित होती है, तब यह केवल व्यक्तिगत अनुभव नहीं रहती, बल्कि यह एक सामाजिक समस्या बन जाती है। 
हरियाणा की मिट्टी अपनी मेहनत, परंपरा, और संस्कृति के लिए जानी जाती है, लेकिन इस मजबूत ज़मीन के भीतर कुछ ऐसे बीज भी हैं जो जाने - अनजाने असमानता और हिंसा की जड़ों को पोषित करते हैं। जो ना किसी को दिखते हैं और ना ही कोई उन्हें देखना चाहता है क्योकि वो परंपरा और संस्कृति के तले ढके हुए हैं ! जहाँ लड़की और लड़के के जन्म से ही उनके लिए अलग-अलग मानक तय कर दिए जाते हैं! जैसे “लड़का कमाएगा”, “लड़की घर संभालेगी”, “लड़का बाहर खेलने जा सकता है”, “लडकियों को जोर से हँसने तक कि अनुमति नहीं है”, इसमें और भी अनगिनत उदाहरण आते हैं जैसी सोच आगे चलकर हिंसा, भेदभाव ,असमानता और क्राइम का रूप ले लेती है।
हरियाणा में किशोरों के साथ काम करते हुए हमने पाया कि अगर उन्हें हिंसा की गहराई समझनी है, तो उन्हें इसमें भागीदारी करनी चाहिए सिर्फ सुनना या पढ़ना काफ़ी नहीं है । जब हम स्कूलों, पंचायत भवनों या गाँव की चौपालों में किशोरों के साथ काम करते हैं तो हमें यह साफ़ महसूस होता है कि हिंसा का अर्थ केवल मारना या गाली देना नहीं है। यह वो हर स्थिति है जहाँ किसी को उसकी आवाज़, पहचान या स्वतंत्रता से वंचित किया जाता है।
इसी को समझाने के लिए हमने एक बेहद प्रभावशाली गतिविधि अपनाई, “लैंगिक आधारित हिंसा वृक्ष (Gender-Based Violence Tree)” जो सहभागी पढ़ती (Participatory Methodology) पर आधारित है।
जब यह एक्टिविटी शुरू होती है, तो किशोर अक्सर इसे एक साधारण “ड्रॉइंग एक्सरसाइज़” समझते हैं शुरुआत में बच्चो को सोचने में समय लगता है कुछ कहते हैं खासकर लड़के “हमारे साथ तो ऐसा कुछ नहीं होता।” लेकिन जब उदाहरण दिए जाते हैं कि आप लास्ट टाइम कब रोये थे तो लडको को तो ये याद ही नही होता कि वो कब रोये थे फिर उनसे पूछते हैं क्या कभी-कभी आपका रोने का मन करता है जब कोई कुछ बोल दे जब हमें बहुत बुरा लगता है तो आप क्यों नहीं रोते तो वे सक्रिय रूप से शामिल होते हैं जैसे-जैसे बातचीत आगे बढ़ती है, सेम ऐसे ही पूरी जिन्दगी कमाने का और घर कि जिम्मेदारी निभाने का बोझ किस पर होता है क्या कभी-कभी लड़को का मन करता है वो घर पर रहे, घर के काम करे, और आराम करे कुछ महीने फिर सब बोलते हैं हम ऐसा चाहते तो हैं लेकिन समाज इसकी इजाज़त नहीं देता एक खुले संवाद से फिर लड़को के भी अनुभव खुलने लगते हैं और उन्हें समझ में आने लगता है कि ये तो गलत है जो हमारे साथ भी हो रहा है ये भी तो हिंसा ही है!
हम नहीं बताते कि हिंसा क्या है वो खुद महसूस करने लगते हैं कि हिंसा क्या है? कुछ बच्चे जवाब देते हैं मारना-पीटना, कुछ कहते हैं “डांटना भी हिंसा है” तो कोई कहता है अगर किसी को बोलने नहीं दिया जाए तो वह भी हिंसा है किसी पर कुछ भी जबरजस्ती थोपना हिंसा ही तो है। लेकिन धीरे-धीरे जब कोई कहता है, “मेरी मम्मी को घर से बाहर जाने नहीं देते” या कोई लड़का बोलता है, “अगर मैं रो दूँ तो सब कहते हैं ‘लड़के रोते नहीं” तो कमरे का माहौल बदल जाता है। वो क्षण होते हैं जहाँ संवाद की जड़ें जमती हैं और चर्चा व्यक्तिगत अनुभवों की ओर बढ़ती है।
यह विशेष रूप से इसलिए प्रभावी है इसमें सिखाने वाला और सीखने वाला दोनों एक साथ सीखते हैं इसमें अनुभव, बातचीत और आत्मचिंतन होता है जो हमने खुद ने देखा है, सुना है और किसी ना किसी रूप में महसूस भी किया है!
जब धीरे-धीरे ‘हिंसा का पेड़’ आकार लेने लगता है!
हर बच्चे ने जब अपने समाज की “जड़ों” को पहचानना शुरू किया, तो कमरा जैसे एक आईना बन गया, जिसमें हर कोई अपने अनुभवों की परछाई देख रहा था जैसे रोक-टोक, छेड़खानी, भ्रूण हत्या, लड़कियों की पढ़ाई पर रोक, बाल विवाह, दहेज, मोबाइल या कपड़ों पर पाबंदी आदि|
जब ये पेड़ पूरा होता है, तो कमरे में गहरा सन्नाटा छा जाता है क्योंकि बच्चे पहली बार हिंसा को चित्र के रूप में देख रहे होते हैं। डर, असुरक्षा, सपनों का मर जाना ,विश्वास की कमी ,बीमारियाँ , चुप्पी, आत्मसम्मान की कमी, आत्महत्या तक के विचार तक नहीं रहकर आत्महत्याए होती है
वे चर्चा करते हैं कि कौन सी चीज़ “जड़” है, कौन सा तना और कौन “फल” और यह पूरी प्रक्रिया उन्हें सोचने, सवाल करने पर मजबूर करती है कि हिंसा कि जड़ क्या है और हमें कहाँ काम करने कि जरुरत है!
यहाँ कई बार भावनात्मक पल आते हैं कोई बच्चा अपने परिवार की घटना साझा करता है, कोई कहता है मैंने भी यह देखा है और कोई यह समझता है कि हिंसा केवल महिलाओं पर नहीं, बल्कि पुरुषों पर भी कई रूपों में होती है।
यह प्रक्रिया प्रतिभागियों को संवेदनशीलता और सहानुभूति से भर देती है।
सत्र के दौरान कई बार ऐसी स्थितियाँ आईं जब वातावरण बेहद भावनात्मक हो गया। कुछ बच्चों ने पहली बार अपने दिल की बातें कही, किसी ने कहा कि घर में बेटा और बेटी के लिए अलग नियम हैं, तो किसी ने बताया कि “लड़कियों को मोबाइल तक नहीं दिया जाता, ताकि वो ‘भटक’ न जाएं।”
“प्रकृति ने नहीं कहा कि लड़कियों को घर में कैद करो यह तो समाज की सोच है।” ऐसे वाक्य यह दिखाते हैं कि जब बच्चों को बोलने का मौका मिलता है तो वे समाज की परतों को कुरेदते हैं और यहीं से स्वस्थ संवाद की शुरुआत होती है। इस पूरी गतिविधि से कुछ कोट्स जो उभरते हैं वो दिल को छू जाते हैं जैसे “जब घर में लड़की पैदा होती है तो ऐसा लगता है जैसे कोई मर गया हो।”
“लड़की होना बुरी बात नहीं, पर समाज इसे बुरा बना देता है।”
“अगर हमें पढ़ने दिया जाए, तो हम अपनी ज़िंदगी बदल सकते हैं; वरना यही भेदभाव चलता रहेगा।”
“हम लड़के भी दुख महसूस करते हैं, लेकिन हंसकर सबको दिखाते हैं कि सब ठीक है। हमें रोने की इजाज़त नहीं है।”
यह अनुभव बताते हैं कि हिंसा का दर्द सिर्फ लड़कियाँ नहीं, बल्कि लड़के भी महसूस करते हैं, बस उनके दर्द को समाज “कमज़ोरी” कहकर छिपा देता है। इस गतिविधि से वे यह महसूस करते हैं कि हिंसा केवल “बड़ी घटना” नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की छोटी-छोटी बातें भी हिंसा का हिस्सा हैं , हर सत्र सुचारू नहीं चलता। कभी-कभी चर्चाएँ तीखी हो जाती हैं लड़के और लड़कियाँ असहमति जताते हैं। कभी कोई बच्चा चुपचाप बैठा रहता है क्योंकि उसकी अपनी पीड़ा बहुत गहरी होती है। ऐसे में फैसिलिटेटर को संवेदनशीलता, धैर्य और सहानुभूति के साथ स्थिति को संभालना पड़ता है।
रोचक बात यह है कि गंभीर विषय होने के बावजूद, बच्चे इस गतिविधि का आनंद लेते हैं। वो रंगों, चित्रों, शब्दों और प्रतीकों के माध्यम से अपने विचार व्यक्त करते हैं। कई बार उनकी रचनात्मकता देखकर प्रशिक्षक भी चकित रह जाते हैं। जब यह गतिविधि समाप्त होती है, तो हम देखते हैं कि बच्चे हिंसा के विभिन्न रूपों को पहचानने लगते हैं। वे समझते हैं कि “हिंसा” सिर्फ महिलाओं पर नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति पर होती है जो समाज की तय सीमाओं को तोड़ता है। वे यह भी महसूस करते हैं कि हिंसा की जड़ें सामाजिक हैं, और समाधान भी समाज में ही हैं।
कई बार प्रतिभागी अपने भीतर बदलाव महसूस करते हैं, “अब मैं किसी का मज़ाक नहीं उड़ाऊँगा”, “अब मैं अपने घर में इस बारे में बात करूँगा।”
यही वह क्षण है जब सीखना परिवर्तन में बदल जाता है। लैंगिक आधारित हिंसा कोई “बड़ी शहरों” की या “गरीब परिवारों” की समस्या नहीं यह हमारे समाज की मानसिकता की उपज है।
और इसे मिटाने का रास्ता कानून या नारे नहीं, बल्कि संवाद, शिक्षा और सहानुभूति हैं।
“हिंसा को समझना ही उसका अंत करने की शुरुआत है।”
“लैंगिक आधारित हिंसा पेड़,” हमें सिखाता है कि हिंसा की हर जड़ को पहचानना जरूरी है तभी हम उसके फल को बदल सकते हैं। हरियाणा की मिट्टी में जब ऐसी सोच की जड़ें जमेंगी, तो हिंसा का यह पेड़ एक दिन बराबरी और सम्मान के पेड़ में बदल जाएगा।
“हिंसा की जड़ें सोच में हैं, अगर सोच बदलेगी, तो समाज भी बदलेगा।”

मैं महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाली एक सामाजिक कार्यकर्ता हूँ। मैंने हरियाणा में लैंगिक समानता और महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा के मुद्दों पर लगातार अपनी आवाज़ उठाई है। मार्था फैरेल फाउंडेशन से जुड़े लगभग 40,000 युवाओं, महिलाओं और पुरुषों के साथ मिलकर, मैंने समानता और लैंगिक हिंसा को रोकने की मुहिमों पर काम किया है। 'कदम बढ़ाते चलो' कार्यक्रम के तहत हमने पोस्टर पेंटिंग, नाटक, सुरक्षा ऑडिट और समूह चर्चा जैसे कार्यक्रमों का आयोजन किया।