नई सोच, नई मर्दानगी

Author: Stuti | 14-Jul-2025

 

अक्सर हम लड़कों को सेक्स और लिंग-आधारित मुद्‌दों पर होने वाली बातचीत से वंचित रखते हैं। कभी शर्म के मारे की लोग क्या कहेंगे, तो कभी झिझक जो मुद्‌दों पर फुसफुसाकर चुपके से बात करने को मजबूर करती है। ये सब समाज में लड़कों को भेदभाव भरी परवरिश में बांध देती है। आखिर क्यों है इतनी झिझक, क्यों समाज अभी भी 21वीं सदी में पहुंचने के बावजूद इस लापरवाही, शर्म और अज्ञानता के चक्र मे फंसा हुआ है? इन सभी सवालों के साथ रोज़ मेरे और आपके जैसे कई युवा अपनी पहचान को लेकर भ्रमित रहते हैं।

किशोरावस्था जीवन का ऐसा महत्वपूर्ण भाग है जो बाकी के जीवन की नींव बनता है, पर अक्सर घरों घरो और समाज में इस उम्र तक आते-आते लड़‌कियों पर और भी अधिक पबंदिया लगा दी जाती हैं। वहीं दूसरी ओर लड़कों को और खुली छूट दे दी जाती है।

लड़‌कियों की पहचान उनकी सेक्सुएलिटी से लेके उनके बोल-चाल एंव सोचने के नज़रिये पे ध्यान केंद्रित रहता है। शैक्षिक संस्थानों से लेकर धार्मिक संस्थानों - सब तरफ वो पाबंदियों का चक्र और फैलता चला जाता है। ये सब देख कर लड़के भी विश्वास कर लेते हैं कि वे महिलाओं को नियंत्रित कर सकते हैं, उनकी पहचान को आकार दे सकते हैं, बिना पूछे उनकी पसंद-नापसंद को मान सकते हैं, उनके निर्णय ले सकते हैं और महिलाओं पर अपनी शक्ति का हिंसक प्रदर्शन कर सकते हैं।

इस पूरे चक्र में हम ना तो लड़कों को और ना ही इस समाज को लड़कियों के लिए भेदभाव मुक्त, निष्पक्ष और लिंग संवेदनशील बना पाते हैं। इस पूरी ग्रूमिंग की प्रक्रिया में हम लड़कों को सशक्त और स्वतंत्र लड़कियों और महिलाओं के साथ रहना सिखा ही नहीं पाते, और ना ही समाज को ऐसी लड़कियों और महिलाओं के लिए तैयार कर पाते हैं। इसके साथ ही यही ग्रूमिंग प्रक्रिया लड़कों को दकियानुसी और रूढ़िवादी बना देती है।

वहीं दूसरी ओर भावनाओं को व्यक्त करना, दूसरो के इमोशंस के प्रति संवेदनशील होना, यहां तक ​​की अपने पसंदीदा रंग के कपड़े भी पहनना किशोर लड़कों और पुरुषों के लिए मुश्किल हो जाता है। ये सब उन्हें बहुत "कमजोर" और "बहुत फेमिनिन" लगता है। दिल्ली के टिगरी कॉलोनी के एक लड़के से जब हमने पूछा कि उसे मेकअप करना पसंद है, तो उसने कहा, "अगर लड़के मेकअप करेंगे तो संतुलन बिगड़ जाएगा।" ये कहते हुए उसकी आँखों में सिर्फ़ झिझक ही नहीं बल्कि संदेह की एक झलक उभरी, जैसे की ये विचार ही उसके लिए बहुत अटपटा और अजीब सा हो।

परंतु मज़ेदार गेम और सेशंस के अंत तक उसके विचारों में कुछ विकास दिखाई दिया – “ऐसी लोगों की सोच होती है की ये चीज़ें लड़को की है और ये लड़कियों की,” उसने कहा। अपने दोस्तों और साथियों के साथ बैठकर सुनने और सीखने से उसने कई चीज़ें समझी। समाज में प्रचलित रूढ़िवादिता को तोड़ने के लिए अक्सर पुरानी बातों को भूलकर पुनः सीखने के माध्यम से मानसिकता में परिवर्तन लाने की पहल की जा सकती है।

सीखी हुई बातों को भूलने के लिए हमें खुलकर उनसे बात करनी होगी, किशोर लड़कों के लिए भी सुरक्षित और इन्क्लूसिव जगह बनानी होगी, और सामाजिक मुद्‌दों पर उनकी समझ बढानी होगी।इस पुरुष प्रधान समाज में भी अभी तक हम मर्दानगी के अलग‑अलग रूपों को नही समझ पाये है। इन रूपों को समझने और उन्हें नए सिरे से सकारात्मक आकार देना बेहद ज़रूरी है।


हमें समाज को ये चुनौती देनी होगी कि भावनाओं को व्यक्त करना और दूसरे के प्रति संवेदनशील होना 'कमज़ोरी' नहीं है – व्यक्ति की ताकत है। मीडिया में जो स्टीरियोटाइप दिखाए जाते हैं, उन्हें भी चुनौती देकर एक बेहतर रिप्रेजेंटेशन की मांग करनी होगी।


MFF के सेशंस के दौरान भी शुरुआत में कई लड़को का मानना था, "सिर्फ आदमी ऑफिस जाते हैं।" इस स्टीरियोटाइप को मिटाने तक का सफर अभी लंबा है। एक सेशंस के दौरान एक लड़के ने कहा, "लिपग्लौस लगाने या लंबे बाल रखने वाले लड़के गे होते हैं।" जबकि सच्चाई ये है कि कोई भी व्यक्ति लिपग्लौस लगा सकता है, अगर वे चाहते है। ये सभी व्यक्तिगत रुचियाँ हैं, जिनके बारे में समाज को सोचना या हस्तक्षेप भी नहीं करना चाहिए है।


जेंडर, हमारा सामाजिक लिंग और सेक्स यानि की हमारा प्राकृतिक लिंग दोनो में अंतर है। हमारा सामाजिक लिंग यानी जेंडर तय नहीं है, वो कोई भी व्यक्ति अपनी पसंद या इच्छा के अनुसार चुनता है।  इसमें अपने आप को कैसे एक्सप्रेस करना है वो भी शामिल है। लड़कों के साथ जेंडर और सेक्स से जुडी धारणाओं पर खुलकर बातचीत इसलिए ज़रूरी है, ताकि वे इन सब चीजों को और गहराई से समझ पाएं और एक संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बने। MFF अपने 'कदम बढ़ाते चलो' प्रोग्राम के ज़रिए किशोर लड़को के साथ मिलकर इन मुद्‌दों पर काम कर रहा है और मर्दानगी को उसके अच्छे और संवेदनशील रूपों से जोड़ने के इस अभियान में शामिल है । 2016 से अभी तक, हमने दिल्ली और हरियाणा में 3,281 किशोर लड़कों के साथ लिंग, लिंग-आधारित हिंसा, महावारी, कन्सेन्ट और बाउन्ड्रीज़ जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्‌दों पर बातचीत और मजेदार खेलों के माध्यम से सेशंस लिए हैं। सफ़र अभी लंबा है, ये पहल अभी एक नई सोच की ओर बढ़ती हुई शुरुआत ही है।

आईए, एक और कदम बढ़ाएं – सकारात्मक और संवेदनशील मर्दानगी की ओर।