जब भी हम “नेतृत्व” (Leadership) शब्द सुनते हैं, तो हमारे मन में अक्सर यह आता है कि यह सिर्फ वही लोग कर सकते हैं जिनके पास ज़्यादा पढ़ाई या खास ज्ञान होता है। हम यह भी मान लेते हैं कि नेतृत्व को कुछ तय तरीकों या मापदंडों से ही समझा और परखा जा सकता है।
लेकिन अगर हम इसे थोड़ा अलग तरह से देखें, तो नेतृत्व सिर्फ सिखाया या सीखा ही नहीं जाता, बल्कि यह मुश्किल परिस्थितियों का सामना करने, अपने डर और कमजोरियों से लड़ने, और एक-दूसरे का साथ देने से भी उभरता है, चाहे वह घर के अंदर हो या बाहर। इस तरह का नेतृत्व “स्वाभाविक” (organic) होता है। हर व्यक्ति का अनुभव, उसका परिवार और उसका समुदाय अलग होता है, इसलिए हर किसी का नेतृत्व करने का तरीका और सफ़र भी अलग होता है।
सामाजिक बदलाव लाने के लिए लोगों का साथ आना बहुत ज़रूरी है। जब लोग मिलकर काम करते हैं, तो वह बदलाव के लिए रास्ता बनाते हैं। अक्सर जिन लोगों के लिए यह बदलाव लाया जाता है, वह कई तरह से कमज़ोर स्थिति में होते हैं: समाज में अपनी जगह के कारण, आर्थिक रूप से अस्थिर काम के कारण, या अपनी पहचान के कारण। ऐसे में समुदाय के अंदर ही कुछ लोगों का आगे आकर ज़िम्मेदारी लेना और नेतृत्व करना बहुत ज़रूरी हो जाता है।
इस संदर्भ में समुदाय आधारित स्वास्थ्य सेवाओं में एएनएम (ANM), आशा (ASHA), और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता जिन्हें मिलकर “AAA वर्कर्स” कहा जाता है, का उल्लेख करना आवश्यक है। इन्हें ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, और यह बिल्कुल सही भी है। ये महिलाएँ न केवल स्वास्थ्य सेवाएँ लोगों तक पहुँचाती हैं, बल्कि अपने समुदायों में महत्वपूर्ण नेतृत्व भी निभाती हैं। हालाँकि, यह भी दिलचस्प है कि इनका नेतृत्व व्यापक रूप से तब “दिखाई” दिया, जब कोविड-19 महामारी के दौरान इनके कार्य को सार्वजनिक और संस्थागत मान्यता मिली। यानी नेतृत्व हमेशा नया नहीं था, बल्कि उसकी पहचान और दृश्यता उस समय बढ़ी।
इसी तरह, घरेलू कामगार महिलाएँ भी अपने-अपने घरों और समुदायों में लगातार ज़िम्मेदारी निभाते हुए, सामाजिक नेतृत्व का प्रदर्शन करती हैं। फर्क बस इतना है कि उनका यह नेतृत्व अभी भी “दिखाई” नहीं देता या शायद उसे पहचान नहीं दी जाती। तो सवाल यह है कि क्या हम घरेलू कामगार महिलाओं को सिर्फ़ लाभार्थी या हाशिए पर रहने वाली महिलाओं के रूप में देखते रहेंगे, या उन्हें सामाजिक बदलाव के नेता के रूप में भी पहचानेंगे? क्या नेतृत्व का दिखना ज़रूरी है, या उसका होना ही पर्याप्त है? और आखिर यह तय कौन करता है कि लीडर किसे कहा जाए?

आइए, इसे एक कहानी के माध्यम से समझते हैं |
दिल्ली के दक्षिण-पूर्व ज़िले के तैमूरनगर इलाके में रिंकू अपने परिवार के साथ रहती है। वह एक घरेलू कामगार हैं। उनका दिन सुबह सात बजे शुरू होता है और दोपहर दो बजे तक चलता है। इस दौरान वह अपने नियोक्ता के घर का सारा काम संभालती हैं। इसके बाद वह अपने घर लौटती हैं और घर के सभी काम निपटाती हैं, जिसमें शाम के पाँच बज जाते हैं। शाम को वह अपने समुदाय की महिलाओं के साथ बैठकर उनके मुद्दों पर चर्चा करती हैं। ऐसी ही एक बैठक के दौरान उन्हें पता चलता है कि उनके समुदाय के बाहर एक महिला के साथ घरेलू हिंसा हो रही है।
रिंकू इस बात को गंभीरता से लेती हैं। कुछ अन्य महिलाओं के साथ मिलकर वह उस मामले में हस्तक्षेप करती हैं और पुलिस की मदद से आरोपी को गिरफ्तार करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उस दिन रिंकू रात नौ बजे घर लौटती हैं। अपने घर के काम पूरे करने के बाद वह अगले दिन की तैयारी में लग जाती हैं।
रिंकू, सामुदायिक लीडर
रिंकू की इस कहानी को पढ़ने के बाद यह विचार आता है कि क्योंकि उनके द्वारा महिलाओं के जीवन में लाया गया बदलाव तुरंत स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देता, क्या इसे नेतृत्व का एक कार्य कहा जा सकता है? क्या ऐसे कोई उपकरण (tool) या मापदंड (scale) हैं जिनके माध्यम से यह आंका जा सके कि रिंकू का हस्तक्षेप नेतृत्व का उदाहरण है या उन्हें एक लीडर कहा जा सकता है? एक दिन फोन पर बातचीत के दौरान मैंने रिंकू से पूछा, “क्या आप खुद को एक लीडर मानती हैं?” रिंकू ने तुरंत जवाब दिया, “हाँ, अब मैं खुद को लीडर मानती हूँ। अब मुझे समझ में आया है कि लीडर वही होता है जो निडर हो। निडर ही लीडर है।” मैंने उनसे फिर पूछा, “आपको इतना साहस कहाँ से मिलता है?” रिंकू ने कहा, “मुझे लगता है कि यह हौसला मुझे मेरी माँ से मिला है। और मेरे साथ मेरी एक साथी घरेलू कामगार, सबीता, हमेशा खड़ी रहती हैं। उनके साथ से ही मुझे लड़ने का हौसला मिलता है।
हालाँकि भारत में घरेलू कामगार महिलाओं के नेतृत्व पर ज़्यादा शोध नहीं हुआ है, लेकिन दिल्ली की बस्तियों में एक शांत बदलाव हो रहा है। यह बदलाव है: कामगार महिलाओं का एक-दूसरे का साथ देना, अन्याय के खिलाफ खड़ा होना, और अपने घरों व कार्यस्थलों में लंबे समय से चले आ रहे गलत व्यवहार को बदलने के लिए आगे आकर नेतृत्व करना।
भले ही सामाजिक क्षेत्र में होने वाले “कांफ्रेंस” और “राउंड टेबल” में नेतृत्व के विभिन्न “फ्रेमवर्क” पर चर्चाएँ होती हैं, लेकिन रिंकू जैसी और भी घरेलू कामगार महिलाएँ हैं जो अपने तरीकों से अपने समुदाय में हिंसा के खिलाफ़ लड़ रही हैं और अपने साथी महिलाओं की मदद कर रही हैं। हर वह महिला अपने संदर्भ और चुनौतियों के बीच, अपने तरीकों से खुद को एक नेता मानती है और हर दिन नारीवादी सोच को जीती हैं। उनके लिए हर वह कदम, जो किसी महिला या लड़की को आज़ादी और न्याय की ओर ले जाने में मदद करता है, नेतृत्व का एक जीता-जागता उदाहरण है। उन्हें किसी से लीडरशिप का सर्टिफिकेट लेने की ज़रूरत नहीं है। ज़रूरत है तो साथ खड़े रहने की, एक मज़बूत सपोर्ट सिस्टम बनाने की, उनकी क्षमताओं को पहचानने और उन्हें आगे बढ़ने का मौका देने की।
असल में, हम रिंकू और अन्य महिलाओं को लीडर बना नहीं रहे हैं। हम सिर्फ उन्हें यह एहसास दिला रहे हैं कि वे अपनी लड़ाई के कारण पहले से ही लीडर हैं और साथ मिलकर हम उनकी इस लीडरशिप की कौशल को और मज़बूत कर सकते हैं। ज़रुरत हैं चस्मा बदलने और अगर आपने नहीं पहना हैं तो पहनने की क्योंकि जब तक हम देखने के नज़रिए को बदलेंगे नहीं , बदलाव हमें सिर्फ ठोस रूप में ही नज़र आएगा।