ब्रिटिश जज लॉर्ड ह्यूवर्ट (Lord Hewart) ने 1924 के मशहूर केस Rex v. Sussex Justices में कहा था: “Justice should not only be done, but should manifestly and undoubtedly be seen to be done.” (न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।)
यह सिद्धांत इस बात पर ज़ोर देता है कि न्याय व्यवस्था में जनता का विश्वास तभी बन सकता है जब न केवल प्रक्रिया निष्पक्ष (impartial) हो बल्कि वह निष्पक्ष दिखे भी । पर हमारे काम के अनुभवों से हमने कई बार देखा है कि न्याय कागज़ों और आदेशों में तो मिलता है, लेकिन सर्वाइवर और उसका परिवार उसे होते हुए कभी देख नहीं पाते। इसी संदर्भ में हम इस ब्लॉग के माध्यम से एक ऐसी घटना साझा कर रहे हैं, जो यह दिखाती है कि ‘कागज़ पर न्याय’ और ‘वास्तविक न्याय’ के बीच की दूरी कितनी ज़्यादा है।
केस स्टडी
इसी साल 2025 में, दिल्ली के एक समुदाय में एक छोटे से परिवार के साथ एक घटना घटी, जहाँ एक घरेलू कामगार महिला और उनके पति साथ रहते थे। उनके दो बच्चे थे, एक 12 साल का बेटा और दूसरी 6 साल की बेटी। वह दोनों अपने बच्चों को स्कूल भेजकर सुबह काम पर चले जाते और शाम को ही घर लौटते थे। क्योंकि दोनों माता-पिता काम करते थे, इसलिए बच्चों की देखभाल के लिए वह अक्सर उन्हें अपने करीबी पड़ोसियों के पास छोड़ देते थे, और कभी-कभी उनकी 6 साल की बेटी घर पर अकेली रह जाती थी।
एक दिन, इसी स्थिति को मौका समझते हुए, पड़ोस में रहने वाले 11 साल के लड़के ने उस 6 साल की बच्ची को खेलने के बहाने अपने घर बुलाया और उसके साथ जबरन यौन संबंध बनाया।
कुछ दिनों बाद लड़का फिर से लड़की का यौन शोषण कर रहा था। इस बार लड़की के पिता ने यह सब होते हुए देख लिया। यह देखकर वह घबरा गए और कुछ समझ नहीं पाए। उनको लगा की कोई उनपर विश्वास नहीं करेगा इसलिए उन्होंने तुरंत एक तस्वीर खींची, अपनी बेटी को वहाँ से बाहर निकाला और उसे घर ले आए।
जब लड़की की माँ शाम को घर लौटी और उसे यह बात पता चली, तो वह बेहद परेशान हो गई। उन्होंने सबसे पहले अपनी बेटी को नहलाया, एक बार नहीं, बल्कि कई बार, जैसे वह इस घटना की भयावहता को धो देना चाहती हो।
इसके बाद उन्होंने पड़ोसी के घर जाकर बात की और अपना गुस्सा ज़ाहिर किया। लेकिन जिन लोगों को वह अब तक अपने करीबी मानती थी, उन्होंने इस बात से साफ़ इंकार कर दिया। यहाँ तक कि जब पिता ने तस्वीर दिखाई, तब भी वे मानने को तैयार नहीं हुए कि उनका बेटा गलत था। लड़की की तबीयत बिगड़ने लगी, और बहुत पूछने पर उसने अपनी माँ को बताया कि यह घटना पहली बार नहीं हुई थी। वह लड़का अक्सर खेलने के बहाने बुलाता था और उसके साथ गलत तरीके से पेश आता था। जब वह जाने से मना करती, तो वह उसे डराता-धमकाता था। लड़की की माँ पूरी तरह से दुविधा में थी और समझ नहीं पा रही थी कि अब क्या किया जाए। मदद के लिए उन्होंने मार्था फ़ैरल फाउंडेशन से जुड़े पहलकार (सामुदायिक लीडर) से संपर्क किया। वह तुरंत उनके घर पहुँची और परिवार को सलाह दी कि वह इस घटना की औपचारिक शिकायत दर्ज कराएँ। लड़की के माता–पिता डरे हुए थे, इसलिए उन्होंने शुरुआत में शिकायत करने से इनकार कर दिया। पर लड़की की माँ बहुत परेशान थी और उन्हें पता था कि जो कुछ भी उनकी बेटी के साथ हुआ वह गलत था। उन्होंने अपने पति को बार-बार समझाने की कोशिश की, पर समाज और समुदाय में बदनामी के डर ने पिता को रोके रखा था।
मार्था फ़ैरल फाउंडेशन के फील्ड ऑफिसर ने भी कई बार समझाया और यह भी बताया कि यह पॉक्सो (लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012) कानून के अंतर्गत, यौन शोषण का मामला है और इसे रिपोर्ट करना अनिवार्य है। ये सब समझने के बाद, पति, घर, और समाज के विरोध के बावजूद, लड़की की माँ ने फील्ड ऑफिसर की मदद से चाइल्ड हेल्पलाइन नंबर 1098 डायल कर मामले की शिकायत की। अगले ही दिन थाने से पुलिस उनके घर आई और माँ व बच्ची की सहमति से, उन्हें बयानों के लिए पुलिस स्टेशन ले जाया गया। जब पुलिस घर और थाना पहुँची, तो महिला अधिकारी सादे कपड़ों (plain-clothes) में थीं ताकि बच्ची डर न जाए और खुलकर अपने साथ हुए अपराध के बारे में बता सके। (अच्छा लगा जानकर की पॉक्सो कानून के प्रावधानों का पालन हो रहा था। )
महिला पुलिस अधिकारी ने बच्ची और उसके माता-पिता का बयान दर्ज किया। साक्ष्य के रूप में, पिता ने जो फोटो ली थी, उसे पुलिस ने रिकॉर्ड के लिए अपने पास रखा और बाद में वह फोटो उनसे डिलीट करवाई। (पॉक्सो कानून के अनुसार, पीड़ित/बच्चे के साथ हुई घटना की कोई भी फ़ोटो या वीडियो रखना या संग्रहित करना सख़्त मना है।)
बयान दर्ज करने के तुरंत बाद, महिला पुलिस अधिकारी बच्ची और उसके माता-पिता को सरकारी अस्पताल लेकर गईं, जहाँ बच्ची का मेडिकल एग्जामिनेशन किया गया। यह मेडिकल जाँच सुबह शुरू हुई और देर रात तक चली। जाँच में इंजरी असेसमेंट, जननांग परीक्षण (genital assessment), मौखिक परीक्षण (oral examination), प्रेगनेंसी टेस्ट और HIV टेस्ट शामिल थे। ये सभी परीक्षण महिला डॉक्टर द्वारा, बच्ची और उसकी माँ की सहमति और उनकी उपस्थिति में किए गए।
शाम को एक फॉरेंसिक जाँच बाकी था, जिसके लिए अस्पताल में उस समय कोई महिला डॉक्टर मौजूद नहीं थी। अस्पताल प्रशासन ने उस परीक्षण के लिए एक पुरुष डॉक्टर को भेजा। क्योंकि वहाँ मार्था फ़ैरल फाउंडेशन के दो कर्मचारी भी उपस्थित थे, उन्होंने तुरंत सवाल उठाया और पूछा कि क्या कोई महिला डॉक्टर उपलब्ध है। पुरुष डॉक्टर ने बताया कि सभी महिला डॉक्टरों की शिफ्ट समाप्त हो चुकी है। इस स्थिति को देखते हुए, जब पुरुष डॉक्टर ने माँ से अनुमति मांगी, तो माँ ने स्पष्ट रूप से मना कर दिया कि वह अपनी बेटी का परीक्षण पुरुष डॉक्टर से नहीं करवाना चाहती। (पॉक्सो कानून के अनुसार, किसी भी नाबालिग सर्वाइवर का चिकित्सीय परीक्षण केवल महिला डॉक्टर द्वारा या महिला नर्स या माता-पिता की उपस्थिति और सहमति से ही पुरुष डॉक्टर द्वारा किया जा सकता है।)
मेडिकल एग्जामिनेशन के बाद, महिला पुलिस अधिकारी ने 24 घंटे के भीतर मेडिकल रिपोर्ट और बच्ची के बयान को बाल कल्याण समिति (Child Welfare Committee)-CWC को भेजी। अगले ही दिन, पूरी प्रक्रिया के बाद, वह लड़का जो स्वयं भी नाबालिग था, पुलिस पूछताछ के लिए ले जाया गया।
कुछ समय बाद, उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की। अदालत ने सुनवाई के बाद उस लड़के को दोषी माना और सज़ा सुनाई। साथ ही, अदालत ने पीड़ित बच्ची को मुआवज़ा (compensation) प्रदान करने के लिए दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (Delhi State Legal Services Authority - DLSA) के पास जाने का निर्देश दिया। आश्चर्य की बात यह थी की इस पूरी सुनवाई में सर्वाइवर और उसके परिवार वाले मौज़ूद ही नहीं थे।
कागज़ पर हुआ न्याय, पर ज़मीनी हकीकत कुछ और थी…
शायद आप सोच रहे होंगे कि यह सब इतनी आसानी से कैसे हो गया? क्या हमारा न्याय तंत्र इतना पारदर्शी (Transparent) और सुगम (Accessible) है कि एक घरेलू कामगार महिला की बेटी को इतनी आसानी से न्याय मिल गया? दुर्भाग्य से जवाब है, नहीं। कागज़ पर तो न्याय हुआ, लेकिन उसे “होते हुए देखना” उतना ही मुश्किल था जितना दिल्ली के धुँधले आसमान में तारों को देखना।
जब अदालत में चार्जशीट दाखिल हुई और सुनवाई की तारीख आई, तो पता चला कि न्यायाधीश ने पहले ही निर्णय सुना दिया था और लड़के ने अपनी गलती कबूल कर ली थी। आज तक उस आदेश की एक कॉपी सर्वाइवर या उसके परिवार को नहीं मिली। किसी को नहीं पता कि लड़के को क्या सज़ा मिली। और हैरानी की बात यह है कि वह लड़का आज भी उसी समुदाय में, उसी घर में रह रहा है। जब महिला ने अदालत में पूछा कि अब आगे क्या करना है?, तो जवाब मिला, “आपको मुआवज़ा तो मिलेगा ना, बाकी चीज़ों से आपको क्या लेना देना?”
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि सरकार की ओर से कहा गया: “मुआवज़े के लिए अभी बैकलॉग है, आपको कम से कम एक साल इंतज़ार करना होगा।
NCRB (National Crime Records Bureau) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, देश में बच्चों के खिलाफ़ अपराधों में से 38% मामले पॉक्सो कानून के अंतर्गत दर्ज हुए हैं। सिर्फ़ दिल्ली में ही 7,769 मामले रिपोर्ट हुए हैं। साथ ही NDTV में छपी एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, कुल पीड़ितों में से केवल लगभग 1 प्रतिशत को ही मुआवजा दिया गया। वहीं, 2019 की एक रिपोर्ट, जो सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार की 2016-17 की रिपोर्ट पर आधारित थी; में यह पाया गया कि केवल 4 से 5 प्रतिशत पीड़ितों को ही मुआवजा प्राप्त हुआ था।
यह संख्या केवल आंकड़ा नहीं, एक चेतावनी है। इन आंकड़ों को देखकर सबसे बड़ा सवाल उठता है: क्या बच्चों के लिए बनाई गई हमारी न्याय प्रक्रिया वास्तव में “सर्वाइवर केंद्रित (survivor-centered)” है? और अगर है, तो क्या हर बच्चा और उसका परिवार इस न्याय तक पहुँच पा रहा है? और क्या लोग सच में जागरूक हैं ?
क्या यही न्याय है?
सवाल यह भी उठता है की न्याय का मतलब क्या है? और इसकी परिभाषा कौन तय करेगा? क्या बिना सर्वाइवर की उपस्थिति के सज़ा सुनाना न्याय है? क्या फैसला सुनाकर आदेश न देना न्याय है? क्या सिर्फ़ मुआवज़ा दे देने से न्याय पूरा हो जाता है?
जॉन रॉल्स (John Rawls) ने अपने सिद्धांत Justice as Fairness में कहा था कि न्याय का अर्थ है, समानता, निष्पक्षता (Fair), और हाशिये पे रह रहे वर्गों को अधिकतम लाभ पहुँचाना। पर जब एक घरेलू कामगार महिला और उसकी बेटी को न तो अदालत की कार्यवाही दिखी, न फैसला मिला, और न मुआवज़ा, तो क्या यह न्याय निष्पक्ष कहा जा सकता है? तो फिर यह कैसा न्याय है, जहाँ दोषी उसी मोहल्ले में आज़ाद घूम रहा है, जहाँ अदालत ने बिना सर्वाइवर की उपस्थिति के फैसला सुना दिया और जहाँ मुआवज़ा पाने के लिए भी परिवार को सालों इंतज़ार करना पड़ रहा है, वहीं उस छोटी सी लड़की को अब लोग गलत नज़रों से देखते हैं, अपराधी के बड़े भाई अक्सर सर्वाइवर को डराते और धमकाते हैं।
क्या यह मुआवज़ा (जो आज तक मिला ही नहीं) उस पीड़ा की भरपाई कर सकता है, जो उस छोटी बच्ची ने झेली? क्या यह उसके खोए हुए बचपन को लौटा सकता है? क्या किसी ने यह सोचा कि आज भले ही उसे पूरी तरह समझ नहीं है कि उसके साथ क्या हुआ, लेकिन जब वह बड़ी होगी, तब इस घटना का असर उसके मन और जीवन पर कितना गहरा पड़ेगा?
समुदाय के लोग और लड़के का परिवार आज भी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि गलती लड़के की थी, बल्कि उन्होंने उल्टा आरोप लड़की और उसके परिवार पर लगा दिया कि गलती उन्हीं की थी।
आख़िर, किसी ने यह क्यों नहीं सोचा कि उस लड़के ने यह सब सीखा कहाँ से? और क्या हमारे बच्चे अब भी जागरूकता की रेखा से बहुत दूर हैं? क्या आज का समाज सही और गलत की पहचान खो चुका है? या फिर गलती हमारे क़ानून और व्यवस्था की है, जो बच्चों, बड़ों और बूढ़ों को बार- बार अपराध करने का मौका देता है?
हमारा मानना है की कानून और अदालतें तभी भरोसेमंद बनेंगी, जब न्याय सिर्फ़ किया नहीं जाए, बल्कि दिखे भी, और महसूस भी हो, क्योंकि अगर सर्वाइवर और उसका परिवार न्याय को ‘देख’ नहीं सकता, तो कागज़ों पर दर्ज हर आदेश सिर्फ़ एक अधूरा वादा बनकर रह जाएगा।