
फ़ोन है, पर कभी सही से सीखा नहीं कि इसका इस्तेमाल कैसे करते हैं
यह बात मुझे तब सुनने को मिली, जब मैं मार्था फ़ैरल फ़ाउंडेशन के साथ तैमूर नगर में घरेलू कामगार महिलाओं के लिए डिजिटल साक्षरता पर एक ट्रेनिंग सैशन सत्र आयोजित कर रही थी। स्मार्टफ़ोन उनके हाथ में था, लेकिन उसके फीचर्स और संभावनाएँ अभी भी उनके लिए अनजानी थीं।
यह सिर्फ़ एक महिला की कहानी नहीं थी, बल्कि उन अनेक महिलाओं की कहानी थी, जिनके पास स्मार्टफ़ोन तो है, लेकिन उसका आत्मविश्वास के साथ और अपनी ज़रूरतों के अनुसार इस्तेमाल करने का अवसर अब भी सीमित है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019–21) के अनुसार, भारत में केवल 54 % महिलाओं के पास ऐसा मोबाइल फ़ोन है, जिसका उपयोग वे स्वयं करती हैं।
यह आँकड़ा बताता है कि मोबाइल फ़ोन की बढ़ती पहुँच के बावजूद, डिजिटल संसाधनों तक स्वतंत्र पहुँच और उनका प्रभावी उपयोग आज भी कई महिलाओं के लिए एक चुनौती है।
आज भारत में स्मार्टफ़ोन उपयोगकर्ताओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। महिलाओं तक भी मोबाइल फ़ोन की पहुँच पहले की तुलना में अधिक हुई है। लेकिन सवाल सिर्फ़ फ़ोन होने का नहीं है। सवाल यह है कि क्या हर महिला अपने फ़ोन का इस्तेमाल अपनी ज़रूरतों के लिए, बिना किसी झिझक और बिना किसी पर निर्भर हुए कर पा रही है?
ट्रेनिंग सैशन के दौरान मेरी मुलाकात कई ऐसी महिलाओं से हुई, जिनकी आयु 50 वर्ष से अधिक थी। उन्होंने बताया कि घर में बच्चे और युवा आसानी से स्मार्टफ़ोन चला लेते हैं, लेकिन उनके लिए फ़ोन अब भी केवल कॉल उठाने तक ही सीमित है।
"किसी का फ़ोन आ जाता है, तो मुझे पता है कैसे उठाना है... और फिर कॉल काट भी देती हूँ।"
एक और महिला ने मुस्कुराते हुए कहा,
"किसी से पूछने में शर्मिंदगी महसूस होती है। कई बार लोग बोल देते हैं, 'फ़ोन ले लिया और चलाना नहीं आता।'
फिर दूसरी महिला ने कहा,
"बच्चे भी अपने काम में व्यस्त रहते हैं। उनसे कितनी बार ही पूछूँ? कई बार तो डर लगता है कि कहीं मैं ही फ़ोन खराब न कर दूँ।"
इन बातों में केवल डिजिटल कौशल की कमी नहीं थी, बल्कि झिझक और आत्मविश्वास की कमी भी साफ़ दिखाई दे रही थी। जब सवाल पूछना ही मुश्किल लगने लगे, तो सीखने की पहली सीढ़ी और भी कठिन हो जाती है।
इस ट्रेनिंग सैशन के दौरान मुझे एक और महत्वपूर्ण बात समझ में आई। ट्रेनिंग सैशन तब अधिक सहज हो जाता है, जब हम यह न कहें कि "आज मैं आपको सिखाने आई हूँ," बल्कि यह कहें कि, "आज हम सब एक-दूसरे से कुछ न कुछ सीखेंगे।"
शायद इसी एक वाक्य ने पूरे ट्रेनिंग सैशन का माहौल बदल दिया। महिलाएँ खुलकर बात करने लगीं, अपने अनुभव साझा करने लगीं, सवाल पूछने लगीं और एक-दूसरे की मदद करते हुए नए फीचर्स सीखने लगीं।
मुझे महसूस हुआ कि समुदाय के साथ काम करते समय केवल जानकारी देना ही पर्याप्त नहीं होता। सबसे पहले ज़रूरी होता है ऐसा माहौल बनाना, जहाँ लोग बिना झिझक अपनी बात कह सकें और सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा बन सकें।
इसी ट्रेनिंग सैशन के दौरान एक ऐसा पल भी आया, जो मेरे लिए बहुत खास था।
"पहली बार आज खुद से वीडियो कॉल की है... बहुत अच्छा लग रहा है।"
ये शब्द एक घरेलू कामगार महिला के थे, जिन्होंने पहली बार व्हाट्सऐप के माध्यम से अपनी दोस्त को खुद वीडियो कॉल किया। शायद किसी और के लिए यह एक छोटा-सा फीचर हो, लेकिन उनके लिए यह आत्मविश्वास और डिजिटल दुनिया की ओर बढ़ाया गया एक नया कदम था।
इस ट्रेनिंग सैशन के दौरान हमने केवल स्मार्टफ़ोन के फीचर्स ही नहीं सीखे, बल्कि डिजिटल सुरक्षा पर भी खुलकर चर्चा की।
जैसे ही ऑनलाइन धोखाधड़ी और "डिजिटल अरेस्ट" जैसे विषयों पर बात शुरू हुई, महिलाओं ने अपने अनुभव साझा करने शुरू कर दिए।
एक महिला ने बताया,
"मेरे पापा को एक बार कॉल आया। सामने वाले ने कहा कि आपके बेटे ने किसी लड़की को परेशान किया है और हम उसे पुलिस स्टेशन ले जा रहे हैं। अगर उसे घर ले जाना है, तो इतने पैसे भेज दो। पापा बहुत घबरा गए। मैंने कहा कि पहले भाई को फ़ोन करके देखते हैं। बाद में पता चला कि मेरा भाई तो अपनी दीदी के घर सो रहा था।"
एक दूसरी महिला ने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा,
"आजकल नौकरी दिलाने के नाम पर भी धोखाधड़ी होती है। मुझे पेंसिल का व्यवसाय शुरू कराने का कॉल आया। पहले ₹1200 रजिस्ट्रेशन के लिए माँगे। धीरे-धीरे मैंने लगभग ₹6000 भेज दिए। उसके बाद उनका फ़ोन कभी नहीं लगा।"
इन अनुभवों को सुनते हुए मुझे एहसास हुआ कि डिजिटल साक्षरता का मतलब सिर्फ़ स्मार्टफ़ोन चलाना सिखाना नहीं है। इसका मतलब लोगों को डिजिटल दुनिया में सुरक्षित रहना, सही निर्णय लेना और ऑनलाइन धोखाधड़ी को पहचानना भी सिखाना है।
इस ट्रेनिंग सैशन ने मुझे सिखाया कि कम्युनिकेशन का मतलब केवल जानकारी देना नहीं होता, बल्कि सबसे पहले सुनना होता है।
डिजिटल साक्षरता का मतलब केवल तकनीक तक पहुँच बनाना नहीं है। इसका अर्थ महिलाओं को आत्मविश्वास और नए अवसरों से जोड़ना भी है। जब एक महिला खुद से वीडियो कॉल करती है, व्हाट्सऐप पर फ़ोटो भेजना सीखती है या किसी ऑनलाइन धोखाधड़ी को पहचानकर उससे बचने का निर्णय लेती है, तब वह केवल एक नया फीचर नहीं सीख रही होती, बल्कि अपनी डिजिटल दुनिया में एक मज़बूत कदम रख रही होती है।
और शायद अगली बार जब वह फ़ोन हाथ में उठाएँगी, तो वह यह नहीं कहेंगी—
"फ़ोन है, पर कभी सही से सीखा नहीं कि इसका इस्तेमाल कैसे करते हैं।"
बल्कि मुस्कुराकर कहेंगी— "अब फ़ोन सिर्फ़ मेरे पास नहीं है, मुझे इसका इस्तेमाल करना भी आता है।"