हालांकि अब कोविड‑19 महामारी को खत्म हुए लगभग चार साल हो गए हैं, बहुत से लोग आगे बढ़ चुके हैं, लेकिन बहुत से ऐसे भी हैं जो एक‑एक कदम डगमगा कर आगे बढ़ रहे हैं, जिनमें प्रवासी मजदूर, विशेष रूप से घरेलू कामगार महिलाएँ शामिल हैं।
कोविड‑19 ने सबकी ज़िंदगी को दिशा ही उलट दी, लेकिन जो महिलाएं शहरों में घरेलू कामगार के रूप में काम करती थीं, उन पर कुछ ज़्यादा ही असर पड़ा क्योंकि वे समाज में श्रमिक होने के नाते पहले से ही हाशिए पर हैं। जब लॉकडाउन लगा और ज़िंदगियाँ थम गईं, तो सबसे पहले उनका रोजगार छिन गया। जिन घरों में ये सालों से काम कर रही थीं, वहाँ से एक फोन आया: “अब मत आना।” ना कोई आखिरी वेतन, ना कोई सहायता — एक झटके में सब कुछ बदल गया।
ऐसी परिस्थितियों में, जब सब कुछ डगमगा रहा था, एक ही चीज़ थी जिसने इन महिलाओं को फिर संभाला — एक‑दूसरे का साथ। गुरुग्राम की कुछ महिलाओं ने 2021 में मिलकर एक छोटा‑सा सपना देखा – एक ऐसी जगह जहाँ वे खुलकर बात कर सकें, सीख सकें, और मिलकर कुछ नया कर सकें।
इस बात की ज़रूरत उन्हें लॉकडाउन के बाद इसलिए महसूस हुई क्योंकि लॉकडाउन के दौरान जब वे अपने परिवार के सदस्यों के साथ रह रही थीं, तो उन पर काम का बोझ दोगुना हो गया था। आराम के लिए कोई समय नहीं था, और महामारी का उनके जीवन पर क्या असर पड़ रहा था, यह साझा करने के लिए कोई सहारा या समर्थन व्यवस्था नहीं थी। ज़्यादातर महिलाओं के घर बहुत छोटे थे, अक्सर केवल एक कमरे के। पूरे दिन उसी कमरे में रहना और बेहद कठिन परिस्थितियों का सामना करना कई लोगों के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था। ऐसे माहौल में उन्हें शारीरिक, मानसिक और मौखिक हिंसा का भी सामना करना पड़ता था।
अपने अनुभवों के आधार पर, उन्होंने एक सुरक्षित स्थान की कल्पना की, जो उनके गरिमा और पहचान से जुड़ा हो — और इसे उन्होंने नाम दिया “स्वाभिमान केंद्र”।
शुरुआत में यह केंद्र किसी एक कमरे में चलता था, फिर धीरे‑धीरे किसी बरामदे में। समय के साथ, महिलाओं ने तय किया कि उन्हें एक स्थायी स्थान चाहिए — एक साझा घर जैसा, जहाँ वे मिलने‑जुलने, योजना बनाने, उत्सव मनाने और ज़रूरत पड़ने पर एक‑दूसरे का सहारा बनने के लिए स्वतंत्र हों।
2021 में गुरुग्राम की महिलाओं ने मिलकर यह साझा घर बनाया और उसका नाम रखा स्वाभिमान केंद्र। यह अब एक सामुदायिक सहायता केन्द्र की तरह भी कार्य करने लगा — जहाँ वे नियमित मिलती थीं, योजनाएँ बनाती थीं, उत्सव मनाती थीं, और एक‑दूसरे की ज़रूरत में साथ खड़ी होती थीं।

| कोविड महामारी की दूसरी लहर – 2021 (अप्रैल से जून), स्वाभिमान केंद्र की महिलाओं और घरेलू कामगारों ने समुदाय की सबसे असुरक्षित महिलाओं (जिन्हें तुरंत राशन की आवश्यकता थी), गर्भवती और स्तनपान करा रही महिलाओं की एक सूची तैयार की। फिर उसी हिसाब से राशन किट तैयार की गईं और उन्हें पहुँचाया गया। इस तस्वीर में गुरुग्राम की घरेलू कामगार लीडर्स ट्रक से राशन उतार रही हैं। |
महामारी के बाद जब आय के रास्ते बंद हो गए, तो स्वाभिमान केंद्र की महिलाओं ने मिलकर विचार-विमर्श किया - “अब आगे क्या?” चर्चा के बाद यह पता लगा कि सभी की व्यक्तिगत रुचियाँ और हुनर क्या हैं। किसी को सिलाई आती थी, किसी को कढ़ाई का शौक था, और किसी के पास पुराने कपड़े थे। सभी ने मिलकर बैग, पाउच, लैपटॉप कवर जैसे हस्तनिर्मित उत्पाद बनाना शुरू किया।
उन्होंने खुद ही एक ब्रोशर तैयार करने की योजना बनाई, जिसमें संस्था ने थोड़ी‑बहुत मदद की। इसके बाद उन्होंने वह ब्रोशर पुराने नियोक्ताओं और आस‑पास के लोगों तक पहुँचाया। शुरुआत आसान नहीं थी - कुछ ने तारीफ़ की, कुछ ने टाल दिया। लेकिन महिलाओं ने हार नहीं मानी।
उन्होंने एंटरप्रेनरशिप और मार्केटिंग के तरीकों पर प्रशिक्षण लिया। उन्होंने समझा कि इसे आगे बढ़ाने के लिए उन्हें किन‑किन चरणों से गुजरना होगा। कोई प्रोडक्ट बनाना चाहता, कोई लोगों से बातें करना चाहता - और तय हुआ कि हर कोई अपनी क्षमता के अनुसार योगदान दे, चाहे वह गुणवत्ता हो, पैकिंग हो, या खरीद‑फरोख्त का हिसाब।
ख़ुशी तब बढ़ी जब उन्हें एक संस्था से 200 कपड़े के बैग और बुकमार्क बनाने का ऑर्डर मिला। यह अवसर सभी को एक साथ काम करने का था - कोई कपड़ा काटता, कोई सिलाई करता, कोई हिसाब‑किताब संभालता। यह सिर्फ़ आर्थिक रूप से लाभ नहीं था, बल्कि साझा नेतृत्व और आत्मनिर्भरता का एक सपना था, जो सच हो रहा था।

| गुरुग्राम की घरेलू कामगार महिलाएं स्वाभिमान केंद्र में अपने पहले बड़े ऑर्डर के 200 बैग तैयार होने के बाद पैकिंग करती हुई इस तस्वीर में हैं। |
गुरुग्राम की इस सफलता की गूंज हरियाणा के पानिपत ज़िले के बिचपड़ी गाँव तक पहुँची। गुरुग्राम की महिलाएँ वहाँ पहुँचीं, उन गाँव की महिलाओं से मिलीं और उन्हें अपने संगठन की कहानी सुनाई।
बिचपड़ी की महिलाओं ने प्रेरणा पाई और गाँव के पुरानी चौपाल को महिलाओं के लिए साझा केंद्र में बदलने का प्रस्ताव पंचायत के समक्ष रखा। उस चौपाल में आमतौर पर पुरुष‑लड़के पत्ते खेलते या हुक्का पीते थे, जिससे वह एक पुरुष‑प्रधान स्थान बन चुका था। लेकिन महिलाओं की लगातार बातचीत के कारण पंचायत ने चौपाल को स्वाभिमान केंद्र में बदल दिया। अब वह न तो केवल पुरुष‑प्रधान स्थान है, न ही असुरक्षित स्थल — वहाँ महिलाएँ मिलती हैं, बात‑चर्चा करती हैं, प्रशिक्षण लेती हैं और थाना का SHO या प्रोटेक्शन ऑफिसर ज़रूरी जानकारी देने आते हैं।

| बिचपड़ी स्वाभिमान केंद्र का उद्घाटन |
बिचपड़ी की महिलाएँ भी सीखकर वित्तीय साक्षरता और एंटरप्रेनरशिप के बारे में जागरूक हुईं। उन्होंने बजट बनाना और बचत करना शुरू किया, कुछ ने अपनी दुकान भी खोली।
फिर 2024 में पानिपत के राक्सेड़ा गाँव की महिलाओं ने भी प्रेरणा पाकर पंचायत से मंजूरी ली और गाँव की चौपाल को महिलाओं के लिए एक सुरक्षित केंद्र बनाने का प्रस्ताव रखा। तब रक्शेरा में भी एक स्वाभिमान केंद्र बन पाया।
अब वहाँ महिलाएँ और किशोरियाँ नियमित रूप से आती हैं, कुछ नया सीखती हैं, मिलकर कमाई के अवसर तलाशती हैं। रक्शेरा की महिलाओं ने स्वयं थोड़ी‑थोड़ी पूँजी जमा कर शुरुआती फंड तैयार किया। जब गुरुग्राम की महिलाएँ यह जानकर आईं, उन्हें यह अहसास हुआ कि उन्होंने अपनी आय का कुछ हिस्सा स्वाभिमान केंद्र के इमरजेंसी कोष में जमा कर रखा था - और तब उन्होंने वह राशि रक्शेरा की बहनों को दे दी। यह केवल धन का लेन‑देन नहीं था, बल्कि संवेदनात्मक सहयोग और आपसी समर्थन का प्रतीक था।

| राक्सेड़ा के स्वाभिमान केंद्र में वीडियो देखती हुई महिलाएं |
गुरुग्राम, बिचपड़ी और रक्शेरा — तीनों जगह की महिलाएँ अलग‑अलग पृष्ठभूमि और भाषा की होंगी, लेकिन एक बात उनमें समान है – सपने देखने और उन्हें सच करने की ज़िद। उन्होंने एक‑दूसरे से सीखकर साथ दिया और हर तरह से मदद की — यही “women for women” की सच्ची मिसाल है। यह संगठन की ताकत है, जो ज़रूरी नहीं कि एक ही समुदाय तक सीमित हो; यह अपने मुद्दों और अनुभवों की साझा ताक़त से एक दूसरे से जुड़ती है। हर कहानी अलग‑अलग हो सकती है, लेकिन सपने साझा हैं — गरिमापूर्ण काम का अधिकार और एक सुरक्षित वातावरण।

स्वाभिमान केंद्र की यह कहानी सिर्फ़ आजीविका की नहीं है — यह महिलाओं के स्वाभिमान की कहानी है, जिसे कई बार सामाजिक कारणों से दबा दिया जाता है। यह उनके सम्मान, पहचान और सामूहिक नेतृत्व की वास्तविकता है।